Saturday, 25 May 2019

#NEW GOVERNMENT: POLICY EXPECTATIONS# //नई सरकार: नीतिगत अपेक्षाएँ//

राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती और जाती रहती हैं; सरकारें बनती और बिगड़ती रहती हैं लेकिन कतिपय राष्ट्रहित के ऐसे मुद्दे हैं जो दीर्घकालीन प्रभाव के हैं और जिन की लगातार उपेक्षा के चलते आज भारत समय के एक विषम मोड़ पर खड़ा है। हम दुनिया के प्रगति की दौड़ में काफी पीछे हैं। यूरोप और अमेरिका को तो आज के उन्नत मुकाम पर पहुंचने के लिए दो-तीन सौ साल का समय मिला किंतु भारत के लिए वर्तमान समय काफी चुनौतीपूर्ण है। लोकसभा के चुनाव के परिणाम के बाद नयी सरकार को शुभकामनायें। इस सरकार के समक्ष कई बड़ी चुनौतियाँ मुह बाए खड़ी हैं। अर्थव्यवस्था मंदी की और लुढ़क रही 2-3 फीसदी की गिरावट के साथ। काले धन, भ्रष्टाचार का कारगर इलाज अभी बाकी है। कोई फर्क नहीं पड़ने वाला चाहे सत्ता में कोई बैठा हो, यदि व्यवस्था को दीमक की भांति खोखला कर रहे इन मुद्दों का समाधान नहीं हुआ। नोटबंदी और बेनामी भू-संपत्ति नियंत्रण जैसे उपाय तो बचकाने ही साबित होते रहे हैं। इन से न तो काले धन की समस्या कम होने वाली है न भ्रष्टाचार, न आतंकवाद को कम किया जा सकता है और न तीव्र व स्थिर विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। नोटबंदी और जमीन की सीलिंग को तो पूर्व में कांग्रेस की सरकारों द्वारा अपनाए गए। और मोदीजी की नोट बंदी तथा बेनामी संपत्ति के उपाय तो प्रकारांतर से कांग्रेस की परंपरा के विस्तार मात्र है। जीएसटी अवश्य समयानुरूप कदम है।
काले धन और भ्रष्टाचार के समाधान की वास्तव में यदि मंशा है तो सरकार को सात काम अवश्य करने होंगे:
1) व्यक्तियों व सहकारी समितियों तथा गैर कंपनी संस्थाओं पर आयकर समाप्त कर देना होगा, इससे काले धन व भ्रष्ट्चार का सबसे बड़ा जरिया ही समाप्त हो जाएगा। और जो धन अनाप-शनाप के कार्यों तथा खर्चीली पार्टियों में अधिकारियों-नेताओं को खुश करने पर खर्च होता है, उसका उत्पादक उपयोग होने से उत्पादन बढ़ेगा और बिना कोई कर बढ़ाए ही अन्य प्रकार के करों से वसूली हो जाएगी, मुख्यतः जीएसटी, सीमा कर और LVT से कलेक्शन स्वत: बढ़ जाएगा; तथा रेवेन्यू कलेक्शन अधिक बढ़ने पर कंपनियों पर भी आयकर समाप्त किया जाना बेहतर होगा।
नीतिसार है: अर्जित आय पर आयकर समाप्त कर दें ताकि कालाधन बाहर आकर उत्पादन व समृद्धि में लगे। उत्पादन व अर्जन नहीं, उपभोग के बिन्दु पर कर लगे, हस्तांतरण पर शुल्क और प्रदूषण के बिन्दु पर अर्थदण्ड।
2) जमीन की हदबंदी के कानूनों को भूमि मूल्य कर [Land value tax (एलवीटी)] से प्रतिस्थापित कर देना होगा। पूर्व में आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन तथा हदबंदी के कानून लागू किए गए। इन कानूनों के जरिए छोटे जमींदारों और बड़े किसानों को शोषक बताकर, उन्हें बदनाम कर उनकी जमीन तो सीलिंग के दायरे में ला दी गयी। पर, बड़े जमींदारों को इससे बचाने के लिए इन कानूनों में अपवाद डाल दिये गए; यथा-चाय, रबड़, काफी, मसाले आदि के बागानों, गन्ने के फार्म, मत्स्य पालन के तालाबों को इन कानूनों से मुक्त रखा गया, इस बहाने की ऐसा करने से राष्ट्रीय उत्पादन में काफी गिरावट आ सकती है। ये बड़े जमींदार वर्चस्ववादी व सत्ताशाली लोग थे।
पर ऐसे अपवाद गलत थे। राष्ट्रीय उत्पादन प्रभावित ना हो इसके लिए सहकारी अथवा सरकारी खेती को सदस्य संख्या के अनुपात में भूमि के सामूहिक उपयोग की छूट देकर के ऐसा किया जा सकता था। वास्तव में एक आकार से अधिक बड़ी जमीनों पर भूमि मूल्य कर लगाकर भूमि के उपयोग की कुशलता को काफी बढ़ाया जा सकता है। भूसम्पदा मूल्य कर लगाने पर हदबंदी के कानून हटा दें। वैसे भी किसानों पर तो हदबंदी लागू हुई, पर उद्योगपतियों व अमीरों पर नहीं। भूसम्पदा मूल्य कर अमीरी रेखा का काम करेगी, गरीबी रेखा की भांति ।
नीतिसार है: मंहगी व बड़ी जमीनों (बेनामी या सनामी) पर सर्किल वैल्यू के 1% वार्षिक दर से भूसम्पदा मूल्य कर लगाया जाय।
3) बैंकिंग लेनदेनों पर नकद लेनदेनपर निर्धारित कर की अपेक्षा आधे या दो तिहाई के बराबर कर लगाया जा सकता है जैसा कि छोटे कारोबारियों के ऊपर आयकर निर्धारण के तौर पर हो चुका है।
ये तीन उपाय ही अर्थव्यवस्था की कुशलता को बढ़ाने के लिए काफी उपयोगी हैं ऐसे ही उपायों को अपनाकर खाड़ी के आठ देशों, दुबई, अबू धाबी आदि ने 10-15 वर्षों में उन्नति के मुकाम हासिल किए और इनहीं को हमें भी निष्ठापूर्वक अपनाना होगा। बचकाने उपायों से अर्थव्यवस्था को कोई निश्चित गति और दिशा नहीं मिलने वाली।
4)भाषाई आधार पर राज्यों के सन 1956 के पुनर्गठन को भंग कर नए सिरे से राज्यों व समाजों का पुनर्गठन कर समाजार्थिक व प्रशासनिक कुशलता वास्तविक अर्थों में बढ़ई जाय। उन्हीं इकाइयों को राज्य का दर्जा मिलना चाहिए जिसका आकार भारत के सम्पूर्ण भूक्षेत्र के 5% या सम्पूर्ण आबादी के 5% से कम न हो। किन्तु विविधता के समुचित सम्मान व उपयोग हेतु इससे कम आकार के समूहों को भावनात्मक-सांस्कृतिक विरासत व प्राकृतिक-भौगोलिक स्थिति व संभावनाओं तथा अपेक्षाओं के आधार पर पृथक पहिचान एवं स्वायत्त सामाजिक-आर्थिक नियोजन व विकास से तौर पर एक राज्य के भीतर अनेक समाजों का गठन कर दिया जाय। कश्मीर, जम्मू, हिमाचल, लद्दाख व उत्तराखंड (काजाहिलू) पर भी यही नीति चलेगी। धारा 370 को हटाने न हटाने से ज्यादा लाभ नहीं है। यह तो केवल सभी राज्यों को समान दृष्टि से देखने का जरिया है।
विविधताओं का ही उपयोग कर अमेरिका आज सभी पर हावी है। कुल मिलाकर विविधताओं का आदर और वैज्ञानिक उपयोग परोक्ष रूप से ही सही पर विकास-वृद्धि पर गहरा असर डालते हैं।
5) देश को मन्दिर – मस्जिद में उलझाने के बजाय विश्व जनमत को साथ लेकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा मानव धर्म (भागवत धर्म) की ओर आगे बढ़े।
6) इस स्पष्ट जनादेश का सम्मान करते हुए राष्ट्रहित में बुलंद निर्णय लें।
7) हिंदू अविभाजित परिवार, हिन्दू उत्तराधिकार क़ानून, हिन्दू विवाह क़ानून जैसे भेदभावयुक्त सांप्रदायिक अवधारणाओं को बदला जाय। किसी भी तरफ के अतिवाद, कट्टरपन व सनक से बचें।
राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र हित की बात करना या दिखावा करना एक बात है लेकिन राष्ट्र के विकास और राष्ट्रीय हितों को कुशलता से आगे बढ़ाना बिल्कुल अलग मामला है।
🎷यह मीडिया के लिए भी मौका है कि वह सरकारों को संकीर्ण मुद्दों में उलझाने के बजाय विकासमुखी बनने दे।
***जय भोजप्रान्त, जय भोजपुरी***
प्रोफेसर आर पी सिंह
प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Saturday, 18 May 2019

//गांधी को समझना कठिन है, पर जरूरी है//


कट्टरपंथियों के बस का नहीं है कि वे महात्मा गांधी को समझ सकें। नाथूराम गोडसे देशभक्त थे या नहीं यह तो इसी बात से समझा जा सकता है कि उनके कृत्य से कांग्रेस पर कब्जा जमाये सामंतों तथा बड़े जमींदारों का काम बहुत आसान हो गया था। गांधी उनके लिए राह का रोड़ा बने हुए थे। गोली ही मारनी थी तो उसे मारना चाहिए था जिसके नेतृत्व में रजवाड़ों-सामंतों- जमींदारों की तिकड़ी देश को हड़पने का कुचक्र चल रही थी। गांधी ने तो आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस को भंग कर दलविहीन लोकतन्त्र का आह्वान किया था। उन्हें इस बात का भान हो चुका था कि कांग्रेस पार्टी इस परिवारवादी और भ्रष्ट्र तिकड़ी के चंगुल में फँसकर विकास की गति को अकुशल व धीमा कर देगी। आम जन की तरक्की बेहद कठिन हो जाएगी।
जिस बात को लेकर सुभाष चन्द्र बोस ने सन 1939 में प्रांतीय सरकारों के गठन के समय जनप्रतिनिधियों के लोभी व सुविधाभोगी आचरण को लेकर गांधी को चेतावनी भरे पत्र लिखे थे उससे गांधी देर से ही सही, सहमत हो चुके थे (वास्तव में गांधी और सुभाष के मध्य वैचारिक मतभेद मुख्यतः इसी बात को लेकर थे कि  उत्साही सुभाष की अनेक बातों से गांधी तुरंत सहमत होने में असहज होने लगते थे और सुभाष को समय गवाना पसंद नहीं था।) गांधी यह भी समझ रहे थे कि अलग अलग दलों में बंटे अनुयाई/समर्थक विचारधारा की आड़ में अपने दल व नेता की गुलामी करेंगे (कोमल शब्दों में भक्त बनेंगे), न की अपनी अंतरात्मा की  आवाज पर चलेंगे। विचारधारा की बात व्यवस्था को ताज़ी और पहले से बेहतर दिशा देने के लिए की जानी थी। पर सत्तालोलुप  राजनेता अपने उन्माद, सनक, पागलपन, अतिवादी कट्टरपन तथा वैमनष्य के जरिये स्वार्थसाधन को ही विचारधारा के रूप में पेश करने लगे।  गलत, दूषित, दक़ियानूसी या अधूरी-असंतुलित विचारधारा से बेहतर है, विचारधारा हो ही नहीं। अतः गांधी ने दलविहीन लोकतन्त्र की बात की जिसमें जनप्रतिनिधि अपनी सेवा, व्यवहार व काबिलियत के आधार पर चुन के विधायिका में पहुंचेंगे, न कि पार्टी की हवा, गुलामी, पैसा और शराब की बदौलत। आज हम देख रहे हैं कि सभी दलों के राजनेता सार्वजनिक तौर पर तो राष्ट्र ही सर्वोपरि का एलान करते हैं पर वास्तविक व्यवहार में पार्टी और परिवार ही सर्वोपरि चलता है। ऐसे में गांधी का सोचना गलत तो नहीं था। इसीलिए टैगोर, सुभाष से लेकर प्रभात रंजन सरकार तक ने भी दलविहीन को ही उचित माना है।
गांधीजी को ईश्वर की भांति आलोचना से परे रखने की आवश्यकता नहीं है। वे प्रयोगवादी व्यक्ति थे, अपने जीवन को ही उन्होंने सत्य के साथ प्रयोग माना था। गलतियाँ उनसे भी हुई थीं। पर वे अच्छे मनुष्य थे। उनकी हत्या एकदम गलत थी। विभाजन के लिए गांधी को दोषी मानना या उन्हें पाकिस्तान का जनक कहना गलत है। विभाजन के लिए दोनों तरफ के वे कट्टरपंथी, हिंसा मनोवृत्ति व मनभेद बढ़ाने वाले ही असली ज़िम्मेवार थे, जो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति में जाने-अनजाने मददगार बन रहे थे।
 गांधी की आकस्मिक हत्या  के चलते देश में लोकतन्त्र के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया बाधित हो गयी। देश इसी तिकड़ी में फँसकर भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का शिकार हुआ, जिसके विरोध में गणतन्त्र के बाईस वर्ष बाद ही जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का आंदोलन चलाना पड़ा। 
यह अच्छी बात है कि माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी इस मुद्दे पर कट्टरपंथ से परे समझदारी से चलते रहे हैं। वे भलीभाँति जानते हैं कि गांधी पूर्णपुरुष न होते हुए भी गुजरात ही नहीं, पूरी दुनिया के सामने भारत का गौरव हैं।
****प्रोफेसर आर पी सिंह
प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Sunday, 2 December 2018

बंटवारे पर बदलें बचावी विदेशनीति, तभी अमन चैन


👉करतारपुर कोरिडोर के उद्घाटन अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा श्रीयुत इमरान खान द्वारा कुछ विवादित मुद्दों के उल्लेख को अनावश्यक, नकारात्मक व चिंताजनक मानना भारी नीतिगत भूल है। मोहम्मद इमरान खान के अनेक अवसरों पर विवादों पर दिए गए ऐसे बयान भारत को अच्छा अवसर प्रदान कर रहे हैं जिनकी इस देश का भावुक नेतृत्व बार बार अनदेखी किए जा रहा है। बर्लिन की दीवार तो बनने के तीस सालों बाद ही  1991 में ही ढहा दी गयी। कश्मीर, खालिस्तान, बलूचिस्तान, सिन्ध आदि की समस्याओं का समाधान यही है कि 1947-48 के भारतीय उप महाद्वीप के विभाजन की राजनीतिक व मानसिक दीवारों को तो ढहा ही दिया जाय।
👉बंटवारे के बाद इकहत्तर सालों में यदि पाकिस्तान पश्चिमी यूरोप के छोटे देशों की भांति समृद्ध व खुशहाल हो गया होता और भारत खस्ताहाल रह गया होता तो मान लेते कि बंटवारा सही कदम था। पर भारत की अपेक्षा आबादी का आधा घनत्व रखने वाले पाकिस्तान को वहां के नेतृत्व ने जिस तरह बार बार गुमराह कर उसे खस्ताहाल और दीवालिएपन की हालत में पहुंचा दिया, यह साम्प्रदायिक आधार पर भारत के विभाजन को एकदम गलत साबित करता है। अतः द्विपक्षीय व वैश्विक स्तर पर सभी सम्पर्कों में दुनिया में आतंकवाद व अशांति के समाधान के लिए विभाजन की दीवार को गिराना पहली राजनीति व कूटनीतिक प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्सान मंगल और बृहस्पति पर पहुंच जा रहा है तो विभाजन का निरस्तीकरण असम्भंव तो नहीं है। जो विभाजन  सत्तर सालों से विश्वशांति के लिए खतरा बना हुआ है, जो अल-कायदा, तालिबान, लश्कर और ISIS के उदय का निमित्त है उसके निरस्तीकरण में ही देश और दुनिया की भलाई है।
👉भारतीय नेतृत्व को ऐसे अवसरों को हर मंच पर खूब भुनाना चाहिए भले ही अवसरवादिता का तमगा लगे। भारतीय नेतृत्व को चाहिए कि अमन चैन के इच्छुक सभी देशों पर दबाव बनाए कि पाकिस्तान की एक संम्प्रभु राष्ट्र की मान्यता समाप्त करें और भारत सरकार को यह कदम पहले ही उठा लेना चाहिए। भारत के नक्शे में पाकिस्तान को अपने देश का अभिन्न पर बाधाग्रस्त क्षेत्र/disturbed area दिखाना चाहिए ताकि विवाद पैदा कर बारम्बार सफाई दी जाय कि बिना ऐसा कदम उठाए दुनिया में शांति और सौहार्द्र की बातें खोखली हैं। एक स्वतंत्र पाकिस्तान के बने रहना दुनिया के अमन चैन के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भारत के विदेश नीति व सैन्य नीति बचाव की मुद्रा में रखने की जरूरत नहीं है।
👉इमरान भारत के अच्छे दोस्त हैं और हमें बात को हर कहीं ले जाने का अच्छा अवसर दे रहे हैं। भारत में शांति होगी तो ही दुनिया में शांति स्थापित हो सकेगी।
🙏यदि आप इस सन्देश से सहमत हैं तो इसे अधिक से अधिक शेयर करें।
💐डा० रवि प्रताप सिंह, आचार्य, दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय एवम् प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Friday, 19 January 2018

Rape--The Alcohol Connection

इस तरह की ठंड में दारू और चिकन का संयोजन ऐसा गुल खिलाता रहा है कि इनका सेवन कर अपराधी मासूम बच्चियों का अपहरण कर हाईवे पर दरिंदगी कर रहे हैं और बहुत से नशेड़ी साधु-संत अपने आश्रमों में। पर साधू – सन्तों के बैशाखी वाली सरकार पूरे देश में नशाबन्दी लागू करने में हिचकती रही है, क्या महज इसलिए कि बहुतेरे साधू संन्यासी भी नशाखोर रहे हैं। बडी़ बडी़ बातें करने वाली ‘बेटी बचाओ’ सरकार गुजरात और बिहार में नशाबन्दी लागू कर सकती है पर पूरे देश में नहीं, क्या यह मोदी सरकार का दोगलापन नहीं है। यदि पूरे देश में नशाबन्दी लागू हो जाय तो दारू और चिकन का; ठेकेदार, अधिकारी, पूंजीपति और नेता का गठजोड़ कमजोर पड़ेगा और घृणित अपराध, भ्रष्टाचार और साधनों की बरबादी काफी कम हो जाएंगे, यह बात मोदी-योगी को क्यों नहीं समझ आती! इसके लिए तो यदि संसदीय दलतंत्र ही नहीं लोकतंत्र की बलि भी देनी पड़ जाय तो कोई हर्ज नहीं 
सार्वजनिक स्थानों पर नशाबन्दी (कच्ची और पक्की दोनो) से जनचेतना के साथ नशेड़ियों को अपराध से पहले ही पकड़े जाने का भय रहता है अतः अपराध काफी कम हो जाते हैं। 
गुजरात में तो घरेलू उपयोग हेतु पक्की शराब की home delivery रही है पर सार्वजनिक उपयोग पर पाबंदी रही है। गुजरात नशाबन्दी के बावजूद भारत का सबसे समृद्ध राज्य है। Revenue loss is a myth only.In 41 countries of europe there is no capital punishment rather solitary confinement for lengthy periods in them is harsher than death penalty, hence very low crime rate. In US crime rate has been high despite capital punishment. Hence capital punishment is never a good deterrent and is ineffective & useless. 
Good quality moderate alcohol has been taken as a better alternative to simple water in cold countries. But in hot countries is should be prohibited to avoid addiction and criminal tendencies. In the cold climate on borders and for fighter soldiers and also for medicinal purposes this should be an exception.

Tuesday, 24 November 2015

असहिष्णु कौन है?

इस प्रश्न से अधिक प्रासंगिक है यह कि कौन कितना और कैसै असहिष्णु है। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक संप्रदाय, हर मजहब में जो अतिवादी तत्व हैं, जो fanatics हैं, जो हर तरह से dogma का समर्थन या अपने वर्चस्व व स्वार्थ हेतु संरक्षण करते है असहिष्णुता का सृजन कमोबेश इन्हीं की देन होती है राजनीतिक व्यवस्था के प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन के साथ।
प्रायः यह देखा गया है कि मुसलमान अपने समुदाय के प्रति जितना भाई-चारे का व्यवहार रखते हैं दूसरे समुदायों के प्रति मौके बेमौके, कभी खुले तो कभी छिपे तौर पर उतना ही असहिष्णु हो बैठते हैं। हिंदू इसका लगभग उल्टा ही है। वह दुनिया के सामने जितना सहिष्णु, जितना सज्जन, जितना अतिथि सत्कारी रहा है, अपने लोगों, अपने समुदाय के भीतर उतना ही असहिष्णु रहा विशेषकर निम्नतर जातियों व एक हदतक महिलाओं के प्रति भी; तथा उसकी इसी प्रवृत्ति ने उसे दुनिया के सामने आक्रामक नहीं होने दिया। आरक्षण के मुद्दे पर ही लीजिए। व्यवस्था की सारी अकुशता के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए इसे मीडिया व जनमंचो पर हटाने की मांग करने वाले इस बात की अनदेखी करते हैं कि तमिलनाडु में १९२६ से आरक्षण रहा है और लम्बे समय से यह ७० फीसदी पर रहा है, और वह तमिलनाडु सामाजिक व आर्थिक हर प्रकार से अन्य राज्यों से काफी आगे है। अत: मैं पुनः कहूंगा कि आज का समय आरक्षण नहीं इसके जातीय आधार को हटाने का है।

पश्चिमी दुनिया इस्लामी जेहाद के हठवाद व इससे उपजे इस्लामी आतंकवाद को जानती है फिर भी बीमारी को नासूर बनने के बाद इलाज करने चली है। पर इस इस्लामी आतंकवाद से निपटने में पश्चिमी जगत निहित अन्तर्विरोधों के चलते अपने बल पर अक्षम साबित होना है भले ही वह कितना भी साधन सम्पन्न क्यों न हो। महाभारत की स्थापना हेतु निर्णायक युद्ध का आह्वान करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भागवत धर्म में महाविश्व का सूत्र भी डाल दिया था। अब समय आ रहा है कि दुनिया भागवत धर्म तथा वसुधैव कुटम्बकम के पथ का अनुसरण करे। मानव सभ्यता का विकास, प्रगति व कल्याण सिर्फ मानवता तक रूकने में नहीं है वरन भगवत्ता में प्रतिष्ठित होने में है। इसके लिए डाग्मा आधारित मतों की महाविश्व के महासंग्राम में बलि देनी ही होगी भले ही उसमें हिन्दू मतों में भी निहित dogma व पाखंड ही क्यों न हो। सच्ची सहिष्णुता तो विज्ञान व टक्नालोजी का दर्शन व अध्यात्म के साथ संयोजन के द्वारा ही सम्भव है जिसका हल्का संकेत कभी आइंसटीन ने दिया था। विज्ञान व टक्नालोजी के उपकरण अधूरे भले ही हों पर वे अधिक विश्वसनीय हैं। बुद्धि, विवेक व अध्यात्म की मदद से ये अपनी आगे की दिशा भी खोजकर पूरी कर लेंगे ।

Thursday, 12 November 2015

हिन्दुत्व नहीं, वसुधैव कुटम्बकम का पथ

यदि विश्व के करीब ८० देश इस्लामी राष्ट्र हो सकते हैं और कुछ ऐसी ही संख्या ईसाई देशों की हो सकती है तो भारत ही क्यों चार-छ:-दस देश अगर हिंदू  राष्ट्र बन जायें तो हर्ज क्या है, ऐसी संकल्पना में कोई सैद्धांतिक त्रुटि तो नहीं लगती। ऐसी संकल्पना आज से 150-200 साल पहले शायद अपनाना आसान होता। जिस राष्ट्रवाद ने, जिस nationalism ने, मध्यकाल में यूरोप को जाति व क्षेत्र के आधार पर 400 वर्षों तक खून से लथपथ कर बहुत ही छोटे-छोटे  टुकड़ों में बाँट दिया उसकी तर्ज पर हम हिन्दू राष्ट्रवाद को लेकर आज अगर आगे बढ़ते हैं तो यह सफल होने के बजाय देश के भीतर व बाहर हावी विरोधी शक्तियों को ही अतिसावधान व मजबूत करेगा। विज्ञान व तकनीकी प्रगति ने बदलते समय के साथ मिलकर राष्ट्रवाद की धार को अब काफी कुन्द कर दिया है।
जिस ब्रिटिश, जर्मन व इतालियन राष्ट्रवाद ने उपनिवेशवाद के साथ संयुक्त होकर साम्राज्यवादी शोषण का कहर ढाते हुए सारी मानवता को पददलित किया उसी की प्रतिक्रिया में विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उद्घोषण। की ‘मानवता की कीमत पर मैं राष्ट्र भक्ति व राष्ट्रवाद को स्वीकार नहीं कर सकता ।‘ टैगोर ने भविष्य की उभरती प्रवृत्तियों का सटीक आकलन करते हुए ही विश्ववाद व ‘विश्वजनेर पायरतलेर सेई तो स्वर्गभूमि’ का आह्वान किया जो वसुधैव कुटम्बकम व मानवधर्म (भागवत धर्म ) की भारतीय संस्कृति की मूलभूत संकल्पना का ही अनुगामी है। आज तो समूचा विश्व गूगल का ग्लोबल विलेज बन चुका है ।
हिन्दू शब्द को लेकर अभी कुछ दिनों पूर्व RSS ने अपने Facebook के Notes Section में बड़ी अच्छी व्याख्या प्रस्तुत की है जो RSS के हिन्दुत्व वादी चिन्तन के मद्देनजर स्वाभाविक है और लाजिमी भी। यह सच है कि कभी देश के लिए अपना सर्वत्र न्योछावर करने वाले वीरों, विद्वानों व मनीषियों ने हिन्दू  शब्द को विदेशागत होने के बावजूद अपनाया और इनका त्याग व बलिदान ही वह ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी' लम्बे  इतिहास के थपेडों-झटकों के बावजूद । पर हिन्दू की संकल्पना भारतीय प्रायद्वीप के लोगों के भौगोलिक-सांस्कृतिक अवबोधन हेतु अपनाई  गयी थी। यह उद्देश्य तो विगत दो सहस्राब्दियों में भी पूरा नहीं हो सका। प्राचीन भारत की वसुधैव कुटुम्बकम की आक्रामक नीति को भूलने के साथ ही हिंदू  सिकुड़ता चला गया तथा वह जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता, वर्ण-वर्चस्व, नारी-अशिक्षा, कर्मकांड पर बल पर श्रम की उपेक्षा जैसी उन कुरीतियों में उतरता चला गया जिन्होंने हिंदू संस्कृति के वैज्ञानिक स्वरूप को दुनिया की नजरों से ओझल व मलिन कर दिया । उधर आक्रामक विदेशियों की कट्टरता ने रक्षात्मक हिन्दुत्व को अन्यों की भाँति एक परम्परा, एक रूढि़, एक मजहब में परिणत कर दिया ।
हिन्दुत्व की जो भौगोलिक-सांस्कृतिक संकल्पना विगत दो सहस्राब्दियों में अधूरी रही उसे आज के हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद के शस्त्र से प्राप्त करना चाहते हैं जो आज की परिस्थितियों में हमारे प्रयास से पहले ही दुनिया को अवरोध व प्रतिरोध के लिए तैयार कर देता है जैसा कि असहिष्णुता व आतंकवाद के मुद्दे पर देखा जा रहा है। हमारे पास वसुधैव कुटम्बकम व भागवत धर्म के अमोघ अस्त्र विद्यमान हैं । इन अस्त्रों के द्वारा हम न्यूनतम प्रतिरोध के साथ विश्वमानवता को साथ ले सकते हैं। तब राष्ट्र वाद के कुन्दधार वाले मध्यकालीन शस्त्र से काम चलाने की संकीर्ण रक्षात्मक दृष्टि बदलनी ही होगी। राष्ट्रवादी शस्त्र के उपयोग की सीमाएँ हैं। किसी क्षेत्र को दासता से मुक्त कराने, या अपने पक्ष में माहौल बनाने तक तो इसका उपयोग बनता है। वैश्वीकरण के दौर में इसका विकासगत प्रयोजन सीमित होता जा रहा है । कई बार तो राष्ट्र वाद का उपयोग क्षेत्रीय मुद्दों की उपेक्षा करने अथवा क्षेत्रीय अपेक्षाओं को दबाने हेतु किया गया है । एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक भाषा के नाम पर पूर्व में गठित सोवियत  रूस का ‘टकेसेर माटी, टकेसेर सोना' वाला राज्य तथा उसका पतन इस बात का उदाहरण है।
हालिया चुनाव परिणामों के माध्यम से जनता ने तो समय की दीवार पर यही सन्देश चस्पा किया है कि हिन्दुत्व के बहाने प्रतिक्रियात्मक व दकियानूसी कट्टर वाद को बढ़ावा देना नहीं चलेगा, हिन्दुत्व के बहाने सटोरियों व पूंजीवादियों के हाथों कठपुतली बनना, राष्ट्र वाद के हथियार से समाजवाद को कुचलना नहीं चलेगा । जिस तरह से दाल, तेल जैसी आवश्यक वस्तुओं के दाम अप्रत्याशित ऊँचाईयों को छूने लगे, रेलभाड़े में भारी पर छिपी वृद्धि हुई है , काले धन के स्त्रोतों को बन्द करने के बजाय पहले इसे बाहर जाने देने और फिर वापस लाकर आम आदमी का जेब भरने के फालतू वादे और कवायद आखिर यही तो साबित करते है। उग्र राष्ट्र वाद को बाजार और प्रचार का जरिया बनाते समय लोग भूल जाते हैं कि राष्ट्रीय हितों की वास्तव में ठंडी तथा कुशल बुद्धि से रक्षण करना तो प्रत्येक राष्ट्र की सफलता की पूर्व शर्त है, जो नीति व परिणाम में दिखना चाहिए। यह नारेबाजी या प्रदर्शन का विषय नहीं है । भारत ही नहीं विश्व के सभी नैतिक शक्तियों को साथ लेना होगा । उन्हें व्यवस्था के केंद्र में स्थापित करना होगा, प्रतिक्रियात्मक व दकियानूसी तत्वों को दरकिनार करना होगा। स्लोगनबाजी व शब्दों की लफ्फाजी से काम नही चलेगा, काम करना पड़ेगा, जन समस्यायों का वास्तव में समाधान करना होगा। समय ने अनेकों बार दर्शाया है कि आज जो बिहार सोच रहा है कल वही पूरा हिन्दुस्तान सोचने को बाध्य होता है।