Friday, 12 July 2019

भोजपुरी विरोध: भ्रांतियाँ एवं तथ्य


🎷कतिपय बुद्धिजीवी अज्ञानतावश भोजपुरी के विरोध पर उतारू हैं। भोजपुरी का दुर्भाग्य रहा है कि इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही भोजपुरी को भाषा में सीमित कर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं। पर छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना, विदर्भ, सौराष्ट्र, उत्तराखंड या बुंदेलखंड की ही भांति भोजपुरी भी क्षेत्र की पहिचान, राज्य, संस्कृति, स्वाभिमान तथा विकास ही मुद्दा है भाषा का नहीं। फिर भी अगर लोग इसकी प्रबल अभिव्यक्तिगत क्षमता का मर्यादित उपयोग करते हैं तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं है।
भाषा की आड़ में असली मुद्दे पीछे होते रहे हैं। कुछ वर्षों तक अनेक लोग ‘भाषा भोजपुरी, राज्य पूर्वाञ्चल’ का प्रचार करते रहे। इन लोगों ने बड़ी चतुराई से पहिचान व प्रदेश से हटाकर भोजपुरी को भाषाई हथियार बना दिया। ऐसे लोग भी कम नहीं है जो भोजपुरी प्रायः तब बोलते हैं जब किसी मजदूर या रिक्शावाले को मजदूरी भुगतान में दबाना होता है। भोजपुरी इनके लिए शोषण का ही जरिया रहा है। पर यह विकासोन्मुख समाज आंदोलन के लिये ठीक नहीं है।  
🎷भोजपुरी भाषा का नहीं बल्कि इस क्षेत्र व जनता की संस्कृति, पहिचान, आत्मविश्वास तथा विकास का व्यापक विषय है। ठीक जैसे तेलंगाना व आन्ध्र दो भिन्न पहिचान व संस्कृतियां हैं भले ही भाषा तेलुगू है। पर भाषा में सीमित कर भोजपुरी संस्कृति ही नहीं इस क्षेत्र व जनता को भी लम्बे समय से काफी क्षति पहुंचाई गयी है, भले ही भाषा के व्यवसायियों ने भोजपुरी अभिव्यक्तियों में अश्लीलता परोसकर खूब लाभ कमाया हो।
🎷यदि कुछ लोग प्राइमरी से विश्विद्यालय स्तर तक भोजपुरी के माध्यम से शिक्षण की अपेक्षा करते हैं तो यह समय के पहिए को पीछे ढकेलना ही होगा। पर भोजपुरी की भाषागत सामर्थ्यं का साहित्य, फिल्म या अभिव्यक्तिगत व्यवसायों में मर्यादित उपयोग इस बहाने से नहीं  रोका जा सकता कि इससे हिन्दी कमजोर हो जाएगी। और भोजपुरी की यह सामर्थ्य तो सिद्ध हो चुकी है। संविधान की आठवीं अनुसूची में  शामिल करने से भोजपुरी के इस सामर्थ्य-उपयोग में निश्चित ही और मदद मिलेगी। वैसे गोरख, भर्तृहरि, कबीर की क्रांतिकारी भाषा कभी राज्याश्रय की मोहताज नहीं रही है।   
🎷कुछ लाख सिन्धी शरणार्थियों की सिन्धी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से गुजराती भाषा को आजतक खतरा पैदा नहीं हुआ। फिर भोजपुरी को मान्यता देने से हिन्दी कमजोर नहीं होगी बल्कि और समृद्ध ही होगी। हिन्दी को असली खतरा तो अंग्रेजी से है, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका आदि से नहीं। यह भी सच है कि भाषा को संवैधानिक मान्यता मिल जाना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। मैथिली व सिंधी इस बात के उदाहरण हैं। स्वयं हिन्दी राजभाषा की संवैधानिक मान्यता के बावजूद 72 वर्षों में राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। वैसे राष्ट्रभाषा की अवधारणा ही दोषपूर्ण और घातक है। दो-तीन भाषाओं को राष्ट्रीय संपर्क भाषा तथा इसी तरह राज्यों में प्रांतीय संपर्क भाषा का उपयोग बेहतर है। भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से इस क्षेत्र का सम्मान बढेगा। यहां की जनता में आत्मविश्वास व विकास का भाव बढ़ेगा तथा उनमें हीनता तथा नकारात्मकता समाप्त होगी।
🎷 भोजपुरी पहिचान व राज्य का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय संबन्धों के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है। नेपाल के 10 जिलों में (4 जिलों में खाँटी) भोजपुरी बोली जाती है। फिर मारिशश, सूरीनाम, फ़िजी आदि 14 देशों का सांस्कृतिक आधार ही भोजपुरी है, भाषा भले ही कुछ भी हो। अतः भोजपुरी भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण घटक है। इसकी उपेक्षा मूर्खता है।          
🎷 प्रगतिशील समाजवाद दर्शन के प्रणेता श्री प्रभात रंजन सरकार का ही कथन है “भविष्य में भाषागत व सांस्कृतिक विमिश्रण से जैसे-जैसे विभिन्न समाज नजदीक आते जाएंगे दक्षिण पूर्व एशिया एक समाज में बदल जाएगा।" (सामाजिक – आर्थिक समूहीकरण, कणिका में प्रउत, भाग 13, 1979) तब भाषा व संस्कृति भेद तो समाप्त हो जाएगा लेकिन प्रशासनिक कुशलता, विकास, पहिचान, विरासत, विविधता व रोचकता के नजरिए से तेलंगाना, आंध्र, तमिल, बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब की भांति एक उचित आकार के कुशल राज्य के तौर पर पृथक भोजपुरी, अंगिका, विदर्भ, सौराष्ट्र की प्रासंगिकता तो हमेशा बनी रहेगी।
🎷जब 13 जिलों और 60 लाख की आबादी पर हिमाचल और उत्तराखंड बनाए जा सकते हैं, 18 जिलों पर झारखंड बन सकता है तो 27 जिलों के बृहत्तर क्षेत्र पर भोजपुरी क्यों नहीं?
🎷राज्य के नाम व राजधानी का मुद्दा भी जनता जनार्दन के कालगत रुझान पर छोड़ देना चाहिए। वैसे तो इसके लिए भोजप्रांत, भोजभूमि, भोजखण्ड, भोजांचल, काशीराज जैसे कई अच्छे नाम सामने है।
🎷पूर्वांचल शब्द शब्द सुनने में भले ही अच्छा लगे पर अवधारणा गलत है क्योंकि यह किसी भी तरह भारत के पूर्वी हिस्से में नहीं आता। फिर इलाहाबाद व आसपास के क्षेत्र तो अवधी में आते हैं।
🎷 जो कथित महान लोग भोजपुरी राज्य या भाषा की संवैधानिक मान्यता का विरोध कर रहे हैं इस क्षेत्र के प्रति अपनी चिरविद्यमान हीनमन्यता, शोषणवृत्ति तथा आत्मविश्वास, समझ व सूझ की कमी के चलते वे ऐसा करने को बाध्य हैं।
जन भोजपुरी मंच तथा हिन्दी बचाओ मंच, दोनों ही गलत और भ्रामक तथ्यों द्वारा सबको गुमराह कर रहे हैं। हिन्दी बचाओ मंच के हवाले से बताया जा रहा है कि भोजपुरी भाषा में रामचरितमानस, पद्मावत, सूरसागर जैसा एक भी ग्रंथ नहीं है। पर गोरख, भर्तृहरि, कबीर जैसे निर्भीक, अध्यात्ममुखी रचनाकार तथा महाकवि घाघ जैसे वैज्ञानिक साहित्यकार दूसरी भाषाओं में कहाँ मिलते हैं! हरेक की अपनी खूबियाँ है। ऐसी ही तमाम बचकानी दलीलें दोनों तरफ से दी जा रही हैं। पर दोनों ही भोजपुरी को केवल भाषा का मुद्दा बनाए रखने पर तुले हैं।  दोनो ही भारत के प्रधानमंत्री तक को बकवास लिखकर भेज रहे हैं।
🎷 पाली भाषा 2500 वर्षों पूर्व बुद्ध के काल में चलती थी। आज यह प्रचलन से बाहर होते हुए भी विश्वविद्यालयों में अध्ययन व शोध का विषय है। बौद्ध तथा जैन साहित्य को ठीक से समझना है तो पाली जानना आवश्यक है। पाली किसी राजनेता की  मांग पर नहीं बल्कि अकादेमिक आवश्यकता के चलते पढ़ाई जाती है। यही बात भोजपुरी पर भी लागू होती है।    
🎷 भोजपुरी बोलने और लिखने में ही भोजपुरी का सम्मान है, यह संकीर्ण नज़रिया भोजपुरी आंदोलन को बर्बाद करता रहा है। इसको बदलना होगा। भोजपुरी को इस क्षेत्र व यहाँ की जनता के पहिचान, स्वाभिमान और विकास का मुद्दा बनाना होगा।

प्रोफेसर रवि पी सिंह
दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय एवं
केन्द्रीय प्रशिक्षण सचिव, प्रगतिशील भोजपुरी समाज, वाराणसी

Saturday, 25 May 2019

#NEW GOVERNMENT: POLICY EXPECTATIONS# //नई सरकार: नीतिगत अपेक्षाएँ//

राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती और जाती रहती हैं; सरकारें बनती और बिगड़ती रहती हैं लेकिन कतिपय राष्ट्रहित के ऐसे मुद्दे हैं जो दीर्घकालीन प्रभाव के हैं और जिन की लगातार उपेक्षा के चलते आज भारत समय के एक विषम मोड़ पर खड़ा है। हम दुनिया के प्रगति की दौड़ में काफी पीछे हैं। यूरोप और अमेरिका को तो आज के उन्नत मुकाम पर पहुंचने के लिए दो-तीन सौ साल का समय मिला किंतु भारत के लिए वर्तमान समय काफी चुनौतीपूर्ण है। लोकसभा के चुनाव के परिणाम के बाद नयी सरकार को शुभकामनायें। इस सरकार के समक्ष कई बड़ी चुनौतियाँ मुह बाए खड़ी हैं। अर्थव्यवस्था मंदी की और लुढ़क रही 2-3 फीसदी की गिरावट के साथ। काले धन, भ्रष्टाचार का कारगर इलाज अभी बाकी है। कोई फर्क नहीं पड़ने वाला चाहे सत्ता में कोई बैठा हो, यदि व्यवस्था को दीमक की भांति खोखला कर रहे इन मुद्दों का समाधान नहीं हुआ। नोटबंदी और बेनामी भू-संपत्ति नियंत्रण जैसे उपाय तो बचकाने ही साबित होते रहे हैं। इन से न तो काले धन की समस्या कम होने वाली है न भ्रष्टाचार, न आतंकवाद को कम किया जा सकता है और न तीव्र व स्थिर विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। नोटबंदी और जमीन की सीलिंग को तो पूर्व में कांग्रेस की सरकारों द्वारा अपनाए गए। और मोदीजी की नोट बंदी तथा बेनामी संपत्ति के उपाय तो प्रकारांतर से कांग्रेस की परंपरा के विस्तार मात्र है। जीएसटी अवश्य समयानुरूप कदम है।
काले धन और भ्रष्टाचार के समाधान की वास्तव में यदि मंशा है तो सरकार को सात काम अवश्य करने होंगे:
1) व्यक्तियों व सहकारी समितियों तथा गैर कंपनी संस्थाओं पर आयकर समाप्त कर देना होगा, इससे काले धन व भ्रष्ट्चार का सबसे बड़ा जरिया ही समाप्त हो जाएगा। और जो धन अनाप-शनाप के कार्यों तथा खर्चीली पार्टियों में अधिकारियों-नेताओं को खुश करने पर खर्च होता है, उसका उत्पादक उपयोग होने से उत्पादन बढ़ेगा और बिना कोई कर बढ़ाए ही अन्य प्रकार के करों से वसूली हो जाएगी, मुख्यतः जीएसटी, सीमा कर और LVT से कलेक्शन स्वत: बढ़ जाएगा; तथा रेवेन्यू कलेक्शन अधिक बढ़ने पर कंपनियों पर भी आयकर समाप्त किया जाना बेहतर होगा।
नीतिसार है: अर्जित आय पर आयकर समाप्त कर दें ताकि कालाधन बाहर आकर उत्पादन व समृद्धि में लगे। उत्पादन व अर्जन नहीं, उपभोग के बिन्दु पर कर लगे, हस्तांतरण पर शुल्क और प्रदूषण के बिन्दु पर अर्थदण्ड।
2) जमीन की हदबंदी के कानूनों को भूमि मूल्य कर [Land value tax (एलवीटी)] से प्रतिस्थापित कर देना होगा। पूर्व में आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन तथा हदबंदी के कानून लागू किए गए। इन कानूनों के जरिए छोटे जमींदारों और बड़े किसानों को शोषक बताकर, उन्हें बदनाम कर उनकी जमीन तो सीलिंग के दायरे में ला दी गयी। पर, बड़े जमींदारों को इससे बचाने के लिए इन कानूनों में अपवाद डाल दिये गए; यथा-चाय, रबड़, काफी, मसाले आदि के बागानों, गन्ने के फार्म, मत्स्य पालन के तालाबों को इन कानूनों से मुक्त रखा गया, इस बहाने की ऐसा करने से राष्ट्रीय उत्पादन में काफी गिरावट आ सकती है। ये बड़े जमींदार वर्चस्ववादी व सत्ताशाली लोग थे।
पर ऐसे अपवाद गलत थे। राष्ट्रीय उत्पादन प्रभावित ना हो इसके लिए सहकारी अथवा सरकारी खेती को सदस्य संख्या के अनुपात में भूमि के सामूहिक उपयोग की छूट देकर के ऐसा किया जा सकता था। वास्तव में एक आकार से अधिक बड़ी जमीनों पर भूमि मूल्य कर लगाकर भूमि के उपयोग की कुशलता को काफी बढ़ाया जा सकता है। भूसम्पदा मूल्य कर लगाने पर हदबंदी के कानून हटा दें। वैसे भी किसानों पर तो हदबंदी लागू हुई, पर उद्योगपतियों व अमीरों पर नहीं। भूसम्पदा मूल्य कर अमीरी रेखा का काम करेगी, गरीबी रेखा की भांति ।
नीतिसार है: मंहगी व बड़ी जमीनों (बेनामी या सनामी) पर सर्किल वैल्यू के 1% वार्षिक दर से भूसम्पदा मूल्य कर लगाया जाय।
3) बैंकिंग लेनदेनों पर नकद लेनदेनपर निर्धारित कर की अपेक्षा आधे या दो तिहाई के बराबर कर लगाया जा सकता है जैसा कि छोटे कारोबारियों के ऊपर आयकर निर्धारण के तौर पर हो चुका है।
ये तीन उपाय ही अर्थव्यवस्था की कुशलता को बढ़ाने के लिए काफी उपयोगी हैं ऐसे ही उपायों को अपनाकर खाड़ी के आठ देशों, दुबई, अबू धाबी आदि ने 10-15 वर्षों में उन्नति के मुकाम हासिल किए और इनहीं को हमें भी निष्ठापूर्वक अपनाना होगा। बचकाने उपायों से अर्थव्यवस्था को कोई निश्चित गति और दिशा नहीं मिलने वाली।
4)भाषाई आधार पर राज्यों के सन 1956 के पुनर्गठन को भंग कर नए सिरे से राज्यों व समाजों का पुनर्गठन कर समाजार्थिक व प्रशासनिक कुशलता वास्तविक अर्थों में बढ़ई जाय। उन्हीं इकाइयों को राज्य का दर्जा मिलना चाहिए जिसका आकार भारत के सम्पूर्ण भूक्षेत्र के 5% या सम्पूर्ण आबादी के 5% से कम न हो। किन्तु विविधता के समुचित सम्मान व उपयोग हेतु इससे कम आकार के समूहों को भावनात्मक-सांस्कृतिक विरासत व प्राकृतिक-भौगोलिक स्थिति व संभावनाओं तथा अपेक्षाओं के आधार पर पृथक पहिचान एवं स्वायत्त सामाजिक-आर्थिक नियोजन व विकास से तौर पर एक राज्य के भीतर अनेक समाजों का गठन कर दिया जाय। कश्मीर, जम्मू, हिमाचल, लद्दाख व उत्तराखंड (काजाहिलू) पर भी यही नीति चलेगी। धारा 370 को हटाने न हटाने से ज्यादा लाभ नहीं है। यह तो केवल सभी राज्यों को समान दृष्टि से देखने का जरिया है।
विविधताओं का ही उपयोग कर अमेरिका आज सभी पर हावी है। कुल मिलाकर विविधताओं का आदर और वैज्ञानिक उपयोग परोक्ष रूप से ही सही पर विकास-वृद्धि पर गहरा असर डालते हैं।
5) देश को मन्दिर – मस्जिद में उलझाने के बजाय विश्व जनमत को साथ लेकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा मानव धर्म (भागवत धर्म) की ओर आगे बढ़े।
6) इस स्पष्ट जनादेश का सम्मान करते हुए राष्ट्रहित में बुलंद निर्णय लें।
7) हिंदू अविभाजित परिवार, हिन्दू उत्तराधिकार क़ानून, हिन्दू विवाह क़ानून जैसे भेदभावयुक्त सांप्रदायिक अवधारणाओं को बदला जाय। किसी भी तरफ के अतिवाद, कट्टरपन व सनक से बचें।
राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र हित की बात करना या दिखावा करना एक बात है लेकिन राष्ट्र के विकास और राष्ट्रीय हितों को कुशलता से आगे बढ़ाना बिल्कुल अलग मामला है।
🎷यह मीडिया के लिए भी मौका है कि वह सरकारों को संकीर्ण मुद्दों में उलझाने के बजाय विकासमुखी बनने दे।
***जय भोजप्रान्त, जय भोजपुरी***
प्रोफेसर आर पी सिंह
प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Saturday, 18 May 2019

//गांधी को समझना कठिन है, पर जरूरी है//


कट्टरपंथियों के बस का नहीं है कि वे महात्मा गांधी को समझ सकें। नाथूराम गोडसे देशभक्त थे या नहीं यह तो इसी बात से समझा जा सकता है कि उनके कृत्य से कांग्रेस पर कब्जा जमाये सामंतों तथा बड़े जमींदारों का काम बहुत आसान हो गया था। गांधी उनके लिए राह का रोड़ा बने हुए थे। गोली ही मारनी थी तो उसे मारना चाहिए था जिसके नेतृत्व में रजवाड़ों-सामंतों- जमींदारों की तिकड़ी देश को हड़पने का कुचक्र चल रही थी। गांधी ने तो आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस को भंग कर दलविहीन लोकतन्त्र का आह्वान किया था। उन्हें इस बात का भान हो चुका था कि कांग्रेस पार्टी इस परिवारवादी और भ्रष्ट्र तिकड़ी के चंगुल में फँसकर विकास की गति को अकुशल व धीमा कर देगी। आम जन की तरक्की बेहद कठिन हो जाएगी।
जिस बात को लेकर सुभाष चन्द्र बोस ने सन 1939 में प्रांतीय सरकारों के गठन के समय जनप्रतिनिधियों के लोभी व सुविधाभोगी आचरण को लेकर गांधी को चेतावनी भरे पत्र लिखे थे उससे गांधी देर से ही सही, सहमत हो चुके थे (वास्तव में गांधी और सुभाष के मध्य वैचारिक मतभेद मुख्यतः इसी बात को लेकर थे कि  उत्साही सुभाष की अनेक बातों से गांधी तुरंत सहमत होने में असहज होने लगते थे और सुभाष को समय गवाना पसंद नहीं था।) गांधी यह भी समझ रहे थे कि अलग अलग दलों में बंटे अनुयाई/समर्थक विचारधारा की आड़ में अपने दल व नेता की गुलामी करेंगे (कोमल शब्दों में ‘भक्त’ बनेंगे), न की अपनी अंतरात्मा की  आवाज पर चलेंगे। विचारधारा की बात व्यवस्था को ताज़ी और पहले से बेहतर दिशा देने के लिए की जानी थी। पर सत्तालोलुप  राजनेता अपने उन्माद, सनक, पागलपन, अतिवादी कट्टरपन तथा वैमनष्य के जरिये स्वार्थसाधन को ही विचारधारा के रूप में पेश करने लगे।  गलत, दूषित, दक़ियानूसी या अधूरी-असंतुलित विचारधारा से बेहतर है, विचारधारा हो ही नहीं। अतः गांधी ने दलविहीन लोकतन्त्र की बात की जिसमें जनप्रतिनिधि अपनी सेवा, व्यवहार व काबिलियत के आधार पर चुन के विधायिका में पहुंचेंगे, न कि पार्टी की हवा, गुलामी, पैसा और शराब की बदौलत। आज हम देख रहे हैं कि सभी दलों के राजनेता सार्वजनिक तौर पर तो ‘राष्ट्र ही सर्वोपरि’ का एलान करते हैं पर वास्तविक व्यवहार में ‘पार्टी और परिवार ही सर्वोपरि’ चलता है। ऐसे में गांधी का सोचना गलत तो नहीं था। इसीलिए टैगोर, सुभाष से लेकर प्रभात रंजन सरकार तक ने भी दलविहीन को ही उचित माना है।
गांधीजी को ईश्वर की भांति आलोचना से परे रखने की आवश्यकता नहीं है। वे प्रयोगवादी व्यक्ति थे, अपने जीवन को ही उन्होंने सत्य के साथ प्रयोग माना था। गलतियाँ उनसे भी हुई थीं। पर वे अच्छे मनुष्य थे। उनकी हत्या एकदम गलत थी। विभाजन के लिए गांधी को दोषी मानना या उन्हें ‘पाकिस्तान का जनक’ कहना गलत है। विभाजन के लिए दोनों तरफ के वे कट्टरपंथी, हिंसा मनोवृत्ति व मनभेद बढ़ाने वाले ही असली ज़िम्मेवार थे, जो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति में जाने-अनजाने मददगार बन रहे थे।
 गांधी की आकस्मिक हत्या  के चलते देश में लोकतन्त्र के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया बाधित हो गयी। देश इसी तिकड़ी में फँसकर भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का शिकार हुआ, जिसके विरोध में गणतन्त्र के बाईस वर्ष बाद ही जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आंदोलन चलाना पड़ा। 
यह अच्छी बात है कि माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी इस मुद्दे पर कट्टरपंथ से परे समझदारी से चलते रहे हैं। वे भलीभाँति जानते हैं कि गांधी पूर्णपुरुष न होते हुए भी गुजरात ही नहीं, पूरी दुनिया के सामने भारत का गौरव हैं।
****प्रोफेसर आर पी सिंह
प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Sunday, 2 December 2018

बंटवारे पर बदलें बचावी विदेशनीति, तभी अमन चैन


👉करतारपुर कोरिडोर के उद्घाटन अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा श्रीयुत इमरान खान द्वारा कुछ विवादित मुद्दों के उल्लेख को अनावश्यक, नकारात्मक व चिंताजनक मानना भारी नीतिगत भूल है। मोहम्मद इमरान खान के अनेक अवसरों पर विवादों पर दिए गए ऐसे बयान भारत को अच्छा अवसर प्रदान कर रहे हैं जिनकी इस देश का भावुक नेतृत्व बार बार अनदेखी किए जा रहा है। बर्लिन की दीवार तो बनने के तीस सालों बाद ही  1991 में ही ढहा दी गयी। कश्मीर, खालिस्तान, बलूचिस्तान, सिन्ध आदि की समस्याओं का समाधान यही है कि 1947-48 के भारतीय उप महाद्वीप के विभाजन की राजनीतिक व मानसिक दीवारों को तो ढहा ही दिया जाय।
👉बंटवारे के बाद इकहत्तर सालों में यदि पाकिस्तान पश्चिमी यूरोप के छोटे देशों की भांति समृद्ध व खुशहाल हो गया होता और भारत खस्ताहाल रह गया होता तो मान लेते कि बंटवारा सही कदम था। पर भारत की अपेक्षा आबादी का आधा घनत्व रखने वाले पाकिस्तान को वहां के नेतृत्व ने जिस तरह बार बार गुमराह कर उसे खस्ताहाल और दीवालिएपन की हालत में पहुंचा दिया, यह साम्प्रदायिक आधार पर भारत के विभाजन को एकदम गलत साबित करता है। अतः द्विपक्षीय व वैश्विक स्तर पर सभी सम्पर्कों में दुनिया में आतंकवाद व अशांति के समाधान के लिए विभाजन की दीवार को गिराना पहली राजनीति व कूटनीतिक प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्सान मंगल और बृहस्पति पर पहुंच जा रहा है तो विभाजन का निरस्तीकरण असम्भंव तो नहीं है। जो विभाजन  सत्तर सालों से विश्वशांति के लिए खतरा बना हुआ है, जो अल-कायदा, तालिबान, लश्कर और ISIS के उदय का निमित्त है उसके निरस्तीकरण में ही देश और दुनिया की भलाई है।
👉भारतीय नेतृत्व को ऐसे अवसरों को हर मंच पर खूब भुनाना चाहिए भले ही अवसरवादिता का तमगा लगे। भारतीय नेतृत्व को चाहिए कि अमन चैन के इच्छुक सभी देशों पर दबाव बनाए कि पाकिस्तान की एक संम्प्रभु राष्ट्र की मान्यता समाप्त करें और भारत सरकार को यह कदम पहले ही उठा लेना चाहिए। भारत के नक्शे में पाकिस्तान को अपने देश का अभिन्न पर बाधाग्रस्त क्षेत्र/disturbed area दिखाना चाहिए ताकि विवाद पैदा कर बारम्बार सफाई दी जाय कि बिना ऐसा कदम उठाए दुनिया में शांति और सौहार्द्र की बातें खोखली हैं। एक स्वतंत्र पाकिस्तान के बने रहना दुनिया के अमन चैन के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भारत के विदेश नीति व सैन्य नीति बचाव की मुद्रा में रखने की जरूरत नहीं है।
👉इमरान भारत के अच्छे दोस्त हैं और हमें बात को हर कहीं ले जाने का अच्छा अवसर दे रहे हैं। भारत में शांति होगी तो ही दुनिया में शांति स्थापित हो सकेगी।
🙏यदि आप इस सन्देश से सहमत हैं तो इसे अधिक से अधिक शेयर करें।
💐डा० रवि प्रताप सिंह, आचार्य, दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय एवम् प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Friday, 19 January 2018

Rape--The Alcohol Connection

इस तरह की ठंड में दारू और चिकन का संयोजन ऐसा गुल खिलाता रहा है कि इनका सेवन कर अपराधी मासूम बच्चियों का अपहरण कर हाईवे पर दरिंदगी कर रहे हैं और बहुत से नशेड़ी साधु-संत अपने आश्रमों में। पर साधू – सन्तों के बैशाखी वाली सरकार पूरे देश में नशाबन्दी लागू करने में हिचकती रही है, क्या महज इसलिए कि बहुतेरे साधू संन्यासी भी नशाखोर रहे हैं। बडी़ बडी़ बातें करने वाली ‘बेटी बचाओ’ सरकार गुजरात और बिहार में नशाबन्दी लागू कर सकती है पर पूरे देश में नहीं, क्या यह मोदी सरकार का दोगलापन नहीं है। यदि पूरे देश में नशाबन्दी लागू हो जाय तो दारू और चिकन का; ठेकेदार, अधिकारी, पूंजीपति और नेता का गठजोड़ कमजोर पड़ेगा और घृणित अपराध, भ्रष्टाचार और साधनों की बरबादी काफी कम हो जाएंगे, यह बात मोदी-योगी को क्यों नहीं समझ आती! इसके लिए तो यदि संसदीय दलतंत्र ही नहीं लोकतंत्र की बलि भी देनी पड़ जाय तो कोई हर्ज नहीं। 
सार्वजनिक स्थानों पर नशाबन्दी (कच्ची और पक्की दोनो) से जनचेतना के साथ नशेड़ियों को अपराध से पहले ही पकड़े जाने का भय रहता है अतः अपराध काफी कम हो जाते हैं। 
गुजरात में तो घरेलू उपयोग हेतु पक्की शराब की home delivery रही है पर सार्वजनिक उपयोग पर पाबंदी रही है। गुजरात नशाबन्दी के बावजूद भारत का सबसे समृद्ध राज्य है। Revenue loss is a myth only.In 41 countries of europe there is no capital punishment rather solitary confinement for lengthy periods in them is harsher than death penalty, hence very low crime rate. In US crime rate has been high despite capital punishment. Hence capital punishment is never a good deterrent and is ineffective & useless. 
Good quality moderate alcohol has been taken as a better alternative to simple water in cold countries. But in hot countries is should be prohibited to avoid addiction and criminal tendencies. In the cold climate on borders and for fighter soldiers and also for medicinal purposes this should be an exception.

Tuesday, 24 November 2015

असहिष्णु कौन है?

इस प्रश्न से अधिक प्रासंगिक है यह कि कौन कितना और कैसै असहिष्णु है। वास्तविकता यह है कि प्रत्येक संप्रदाय, हर मजहब में जो अतिवादी तत्व हैं, जो fanatics हैं, जो हर तरह से dogma का समर्थन या अपने वर्चस्व व स्वार्थ हेतु संरक्षण करते है असहिष्णुता का सृजन कमोबेश इन्हीं की देन होती है राजनीतिक व्यवस्था के प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन के साथ।
प्रायः यह देखा गया है कि मुसलमान अपने समुदाय के प्रति जितना भाई-चारे का व्यवहार रखते हैं दूसरे समुदायों के प्रति मौके बेमौके, कभी खुले तो कभी छिपे तौर पर उतना ही असहिष्णु हो बैठते हैं। हिंदू इसका लगभग उल्टा ही है। वह दुनिया के सामने जितना सहिष्णु, जितना सज्जन, जितना अतिथि सत्कारी रहा है, अपने लोगों, अपने समुदाय के भीतर उतना ही असहिष्णु रहा विशेषकर निम्नतर जातियों व एक हदतक महिलाओं के प्रति भी; तथा उसकी इसी प्रवृत्ति ने उसे दुनिया के सामने आक्रामक नहीं होने दिया। आरक्षण के मुद्दे पर ही लीजिए। व्यवस्था की सारी अकुशता के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए इसे मीडिया व जनमंचो पर हटाने की मांग करने वाले इस बात की अनदेखी करते हैं कि तमिलनाडु में १९२६ से आरक्षण रहा है और लम्बे समय से यह ७० फीसदी पर रहा है, और वह तमिलनाडु सामाजिक व आर्थिक हर प्रकार से अन्य राज्यों से काफी आगे है। अत: मैं पुनः कहूंगा कि आज का समय आरक्षण नहीं इसके जातीय आधार को हटाने का है।

पश्चिमी दुनिया इस्लामी जेहाद के हठवाद व इससे उपजे इस्लामी आतंकवाद को जानती है फिर भी बीमारी को नासूर बनने के बाद इलाज करने चली है। पर इस इस्लामी आतंकवाद से निपटने में पश्चिमी जगत निहित अन्तर्विरोधों के चलते अपने बल पर अक्षम साबित होना है भले ही वह कितना भी साधन सम्पन्न क्यों न हो। महाभारत की स्थापना हेतु निर्णायक युद्ध का आह्वान करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भागवत धर्म में महाविश्व का सूत्र भी डाल दिया था। अब समय आ रहा है कि दुनिया भागवत धर्म तथा वसुधैव कुटम्बकम के पथ का अनुसरण करे। मानव सभ्यता का विकास, प्रगति व कल्याण सिर्फ मानवता तक रूकने में नहीं है वरन भगवत्ता में प्रतिष्ठित होने में है। इसके लिए डाग्मा आधारित मतों की महाविश्व के महासंग्राम में बलि देनी ही होगी भले ही उसमें हिन्दू मतों में भी निहित dogma व पाखंड ही क्यों न हो। सच्ची सहिष्णुता तो विज्ञान व टक्नालोजी का दर्शन व अध्यात्म के साथ संयोजन के द्वारा ही सम्भव है जिसका हल्का संकेत कभी आइंसटीन ने दिया था। विज्ञान व टक्नालोजी के उपकरण अधूरे भले ही हों पर वे अधिक विश्वसनीय हैं। बुद्धि, विवेक व अध्यात्म की मदद से ये अपनी आगे की दिशा भी खोजकर पूरी कर लेंगे ।