Friday, 6 December 2019

पेशेवर-परिवारी नहीं, वैज्ञानिक राजनीति ही समाधान है


#पेशेवर-परिवारी नहीं, वैज्ञानिक राजनीति ही समाधान है#
भाग 1/8
पेशेवर व परिवारी राजनीति का अभिशाप
कुछ लोग अक्सर यह सवाल करते हैं कि डा0 भीमराव अंबेडकर, अरबिन्द घोष या टैगोर का आज़ादी की लड़ाई में प्रत्यक्ष योगदान क्या है? सुभाष चंद्र बोस सरीखे कुछ नेताओं ने तो कांग्रेसी आंदोलन से अलग रास्ता अख्तियार कर लिया था। वास्तव में  कतिपय ये बुद्धिमान नेता किसी न किसी रूप में स्वतंत्रता आंदोलन की एक कड़वी हकीकत से वाकिफ हो चुके  थे, खासकर सन 1938-39 के दौरान नौ राज्यों में कांग्रेस के बुढ़ाते मंत्रियों की लालची सुविधाभोगी प्रवृत्ति से (जिसको लेकर कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत से सुभाष चंद्र बोस ने गांधी को पत्र लिखकर चिंता जताई थी)। यह कड़वी हकीकत थी कि राजे-रजवाड़ों, सामंती जमींदारों तथा धनबलियों ने वकीलों को जरिया बना आज़ादी के कांग्रेसी आंदोलन पर कब्जा कर लिया था। परिणाम तो बँटवारे, अराजकता तथा अकुशलता के रूप में ही मिलना था। अतः इस आज़ादी के बाद दुनिया का सबसे बड़ा संविधान ही नहीं बना बल्कि सबसे जटिल और सबसे ज्यादा कानून भी भारत में ही बने। जिन बातों को जापान से लेकर यूरोप तक में प्रबंधकीय-प्रशासकीय नीतियों से ठीक किया गया, उनको नियंत्रित करने के लिए हमने बड़े-बड़े कानून लाद लिये। हम भूल गए कि कानून बनाने से कुशलता, रचनाधर्मिता और प्रभावशीलता नहीं आती, बस केवल न्यूनतम अनुपालन हो पाता है। 
स्वतन्त्रता के बाद पेशेवर व परिवारी राजनीति का उभार प्रकारांतर से राजशाही का पुनर्जन्म ही साबित हुआ है।

भाग 2/8
जापानी चमत्कार से सबक
दूसरे युद्ध के दौरान जापान के आत्मसमर्पण के बाद, सम्राट हिरोहितो (और उनके परिवार) को छोड़कर अधिकांश शीर्ष नेताओं और कमांडरों को फांसी पर लटका दिया गया। अमेरिकी सरकार हिरोहितो को एक अच्छा समुद्री जीवविज्ञानी मानती थी जिन्होंने हाइड्रा की कुछ प्रजातियों की खोज की थी । इससे पहले जापानी सेना शक्तिहीन हिरोहितो को सम्राट के रूप में हाशिए पर रख सभी शक्तियों का उपभोग रही थी । कमांडर इन चीफ टोजो खुद प्रधानमंत्री था और जापानी कैबिनेट के सभी सदस्यों की नियुक्ति सेना की सिफारिशों पर की जाती थी । पर्ल हार्बर पर हमला भी सम्राट की सहमति के बिना जापानी सेना के एक गलत आकलन युक्त अति उत्साही कदम था । आत्मसमर्पण के बाद, जापान को जनरल मैकआर्थर कार्यक्रम के अधीन रखा गया था जिसकी स्वाभाविक दिशा तो  जापान को एक तरह से अमेरिका के राज्य में बदलना हो सकता था खुद की सेना विहीन। यह कदम भारत में मैकाले के कार्यक्रम के समान था।
लेकिन हिरोहितो बुद्धिमान और स्मार्ट व्यक्ति था । उन्होंने JUSE (जापानी यूनियन ऑफ साइंटिस्ट्स एंड इंजीनियर्स) बनाया—एक संगठन जिसमें सदस्य तो संस्थान ही होते हैं व्यक्ति नहीं। जापान को बदलने की प्रमुख भूमिका इसे दी गयी। JUSE उद्योग, संस्कृति, युवा और खेल के सबसे महत्वपूर्ण जापानी मंत्रालय के तहत काम करता रहा है—एक ही मंत्रालय में राष्ट्र और समाज की मुख्य ऊर्जा को शामिल करने की एक दिलचस्प और अनूठी अवधारणा । इसका काम राष्ट्रीय जीवन के लिए समाज से स्थापित क्षमता, स्वच्छ छवि और चरित्र युक्त विशेषज्ञों और नेताओं का चयन करना रहा है । इस तरह उद्योग में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की छवि और क्षमता की स्वत: जांच व नियंत्रण होती है । इसके बाद सरकार में दागी नेताओं को वापस बुलाने (recall) का संवैधानिक प्रावधान एक पूरक अंकुश है । वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को यह वास्तविक शक्ति देकर जापान ने 30 वर्षों के भीतर विकास का वह मुकाम प्राप्त करने में सक्षम बना जो यूरोप और अमेरिका द्वारा लगभग २०० वर्षों में प्राप्त किया गया था ।
१९४५ में आत्मसमर्पण के बाद जापान ने अपने आक्रामक जापानी राष्ट्रवाद को राष्ट्रीय जीवन की रचनात्मक अवधारणा में बदल दिया। जर्मनी ने भी कुछ ऐसा ही किया। राष्ट्रीय जीवन की इस अवधारणा ने एक युद्धनष्ट देश को बहुत ही कम अवधि में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता और समृद्धि के प्रतीक में बदल दिया । इसी रास्ते को शुरू में उत्तर कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और हॉन्गकॉन्ग द्वारा अपनाया किया गया; और बाद में इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, आदि द्वारा।  चीन ने तकनीकी क्रांति के साथ साम्यवादी रूढ़िवाद को मिलाया है जिससे तेजी से उन्नति हुई है मुख्यत: भौतिक दायरे में सीमित। यहां तक कि अमेरिका ने भी इस अनुभव से बहुत कुछ सीखा।
जापान ने जीवन के हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और विशेषज्ञता को महत्व दिया जिससे तेजी से उन्नति हुई जबकि हम भारतीयों ने व्यवस्था के घटिया दर्जे के बिचौलियों (ईश्वर या शक्ति या व्यापार किसी के भी) को अधिक महत्व देने की आदत को पाला हुआ है जिससे राष्ट्रीय प्रणाली कमजोर और खोखली हो गई है । पेशेवर व परिवारी राजनेता भी ऐसे ही घटिया दर्जे के बिचौलिये साबित हुए हैं जिनकी ‘थोथा चना बजे घना’ वाली  समझ के चलते अच्छी योजनाएँ भी अकुशलता का शिकार हो व्यवस्था पर भार ही साबित होती हैं। ऐसे राजनेता समाज में वैज्ञानिकों की सनकी व पागल की ही छवि ही प्रचारित करते रहे हैं। पर आज प्रौद्योगिकी क्रांति के युग में ये  राजनेता पूरी तरह से अप्रासंगिक हो व्यवस्था के भार ही हैं। वैज्ञानिक राजनीति की क्रांति ही अब सही रास्ता है।
हमें भी आक्रामक और हिंसक राष्ट्रवाद को रचनात्मक राष्ट्रीय जीवन की दृष्टि में बदलने की जरूरत है ताकि सार्थक परिणाम सुनिश्चित किया जा सके । राष्ट्रीय और राज्य जीवन, शासन और अर्थव्यवस्था के लिए नेताओं के चयन के एक प्रमुख कार्य के साथ डीएसटी (Department of Science & Technology) को भारतीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी संघ (BUST-Bharatiya Union of Science & Technology) नामक एक संवैधानिक प्राधिकरण के रूप में व्यापक बनाने की जरूरत है । इन चयनित प्रतिभाओं का दो तरह से उपयोग किया जाएगा। जो लोग राजनीतिक चुनाव जीतते हैं, वे विधायिका और सरकारी शासन में जाएंगे जबकि शेष का उपयोग सार्वजनिक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था और प्रशासन में किया जाएगा, इस प्रकार वास्तविक प्रतिभाओं को सम्मान, अवसर, गतिशीलता और महत्व दिया जाएगा। इस पूरी चुनाव प्रक्रिया को राज्य द्वारा वित्त पोषित करना होगा ।
BUST में सदस्य के रूप में 20 वैज्ञानिकों/शोधकर्ताओं का एक बोर्ड गठित हो सकता है—चार उच्चतम न्यायालय द्वारा नामित, चार केंद्र सरकार द्वारा, चार तकनीकी और अनुसंधान संस्थानों से, दो चिकित्सा अनुसंधान संस्थानों से, दो विश्वविद्यालयों से, दो गैर सरकारी संगठनों से और दो उद्योग से । अध्यक्ष को भारत के राष्ट्रपति मनोनीत कर सकते हैं।   

भाग 3/8
पेशेवर राजनीति की भारतीय महाभूलें—कौटिल्य  की सूझ पर पुनर्दृष्टि
भारत एशियाई टाइगरों के चमत्कारों से अनजान नहीं रहा है जैसा कि भाग 2 में बताया गया है । भारत में भी इस दिशा में कुछ प्रयास किए गए। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में मुख्यत: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के नेतृत्व में युवा वैज्ञानिकों और टेक्नोक्रेट्स की एक टीम का गठन किया गया और राष्ट्र को नए युग की तकनीक से चलाने के लिए संबंधित कैबिनेट समिति का गठन किया गया । लेकिन यह कार्यक्रम पूरी तरह से विफल हुआ क्योंकि कार्यक्रम में प्रतिभागियों की निष्पक्षता व सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के लिए तथा धूर्त व दलाल नेताओं के हस्तक्षेप को अच्छी तरह से खत्म करने के लिए कोई उचित प्रणाली नहीं प्रदान की गयी थी।
इसका परिणाम यह हुआ कि चालाक राजनेताओं और उनके पिट्ठूओं द्वारा वैज्ञानिक युवा क्रांति के नाम पर इतनी लूट हुई कि देश 5-6 साल के भीतर दिवालिया हो गया, 1991 में रिजर्व बैंक का सोना गिरवी रखकर IMF से भारी उधार लेना पड़ा । लेकिन प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव की यह बुद्धिमत्ता थी कि उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में अर्थविज्ञानी डॉ0 मनमोहन सिंह के माध्यम से आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात किया । बाद में राष्ट्र ने डॉ0 एपीजे अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति के रूप में सम्मानित करते हुए  अच्छा प्रयोग किया, यद्यपि उन्हें केवल एक अवसर ही दिया गया।
लेकिन यह सब सागर में सिर्फ एक बूंद ही साबित हुआ है । पेशेवर/दलाल/परिवारवादी राजनेताओं का देश व प्रदेश की राजनीति में प्रवेश रोकने का कारगर उपाय किए और इसके बजाय ‘वैज्ञानिक राजनीति क्रांति’ को एक संपूर्ण उपाय के रूप में अपनाये बिना, राष्ट्रीय उत्थान के लिए इस ऐतिहासिक अवसर को फलीभूत नहीं किया जा सकता । कौटिल्य ने अपने पुस्तक का नाम 'राजनीतिशास्त्र'  नहीं बल्कि  'अर्थशास्त्र' रखा क्योंकि वह जानते थे कि प्रौद्योगिकी और राजनीति के मध्य अर्थशास्त्र एक अच्छा संतुलन कारक है। अब समय आ गया है कि इस वास्तविकता से हमारी आंखें न मुड़ें ।
पूंजीवाद और साम्यवाद के बारे में पहले के समय में दुनिया भर में बहस एशियाई टाइगर्स के उदय के बाद अपनी प्रासंगिकता व चमक खो चुकी है । वास्तव में दोनों ही प्रणालियां कमोबेश समान रूप से शोषक हैं, हालांकि उनके तरीके अलग हैं । पूंजीवाद में कई पूंजीपति होते हैं जो राज्य को अपने धन के प्रभाव में लाने की जुगत करते हैं, इसलिए राज्य उन्हें नियंत्रित करने की इच्छा खो देता है, हालांकि इसमें ऐसा करने की क्षमता है। लेकिन साम्यवाद में राज्य स्वयं पूंजीवादी बन जाता है—राज्य पूंजीवाद, इसे कौन नियंत्रित करेगा! अब असली चर्चा दलालों की व्यावसायिक राजनीति बनाम वैज्ञानिक राजनीति को लेकर होनी उचित है।
वैज्ञानिक राजनीति एक ऐसी प्रणाली को संदर्भित करती है जिसमें अर्थव्यवस्था और उद्योग सहित पूरे राष्ट्रीय जीवन का नेतृत्व और संचालन वैज्ञानिकों द्वारा किया जाएगा, न कि पेशेवर और दलाल राजनेताओं द्वारा । प्राकृतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, संगीत, कला, साहित्य, खेल या ऐसे किसी भी क्षेत्र में योगदान करने वाले शोधकर्ता या समकक्ष कार्यकर्ता वैज्ञानिक हैं।

भाग 4/8
जातीय पहचान पर बहानेबाज़ी नहीं, सीधा हमला करें
जापान पर भारत का काफी प्रभाव रहा है-काफी सकारात्मक और कुछ नकारात्मक भी। जापान में भी कभी सामंती, चतुर्जातीय व गुलामी-अछूत व्यवस्था हुआ करती थी जिसे 1866-69 के मेइजी पुनर्स्थापन (Meiji Restoration) के एक ही झटके में समाप्त कर दिया गया बिना किसी मसीहा या अवतार का इंतजार किए। कुछ प्रभावशाली सामन्तियों ने विरोध किया तो आधुनिक मजबूत सेना ने उन्हे कुचल दिया। अमेरिका का भी दबाव इसमें निहित था। पर, जापान ने हमेशा कर्म और काबिलियत पर भरोसा किया है।
भारत में भी जातीय पहचान, जातिवाद, जातीय वर्चस्व और जातीय टकराव को खत्म करने के लिए किसी बचाने या सुधारने वाले महाविभूति के आविर्भाव का, अवतरण का इंतजार करने की आवश्यकता नहीं है। कानून और प्रोद्योगिकी ही सटीक समाधान हैं। टेक्नालाजी जाति व सम्प्रदाय भेद को नहीं मानती। पर यह पेशेवर राजनीति ही है जो अपने जातिगत वोट आधारित सत्ता लाभ हेतु जातिवाद की जड़ों में खाद-पानी डालती रही है। जातीय आरक्षण समर्थक व विरोधी दोनों ही प्रकारान्तर से जातीय पहचान का पोषण करते रहे है।
कानून व संविधान में तत्काल व्यवस्था की जा सकती है कि
a) सरकार द्वारा जातीय पहिचान सूचक उपनामों की सूची जारी हो। नाम में इन उपनामों का प्रयोग अगले दस वर्षों तक निषिद्ध व दंडनीय करार दें—हिन्दू या इस्लाम या किसी भी मजहब में। चाहें तो जातीय पहिचान सूचक उपनामों का जिन कागजातों में उल्लेख है, उन्हे पाँच वर्षों के भीतर बिना उपनाम वाले नए कागजातों से बदलवा दें। मूल अभिलेख सुरक्षित संग्रहालय में जमा करा दें। कम से कम पिछले 20 वर्षों के अभिलेख तो बदले ही जा सकते हैं।
b) हर प्रकार के आरक्षण को भी अगले दस वर्षों तक लंबित कर दें। इस अवधि के बाद सामाजिक प्रगति-परिवर्तन की समीक्षा की जाय।
c) जातीय संगठनों को पूरी कठोरता से प्रतिबंधित करें, भले ही वे जातीय या सामुदायिक सुधार के नाम पर बनी हों। उनके जिम्मेदार पदाधिकारियों का भी दमन करना होगा।
इन सबके लिए संविधान में भी बदलाव करना होगा। संविधान में आरक्षण के स्थान पर जाति-पहिचान उन्मूलन व्यवस्था को प्रतिस्थापित करें।
ऐसा करने से जाति-व्यवस्था व इसपर आधारित वोट की राजनीति की कमर भी टूटेगी। बाकी इलाज़ तेजी से वैज्ञानिक राजनीति और तकनीकी क्रांति से हो जाएगा ।

भाग 5/8
अनुरूपता और रचनात्मकता : गति और अनुशासन
एक व्यावहारिक उक्ति है:
‘अनुशासन विहीन गति घातक है, गतिहीन अनुशासन क्षोभकारी है ।’
संतुलित, सुचारू और निर्देशित विकास के लिए किसी भी समाज को अनुशासन और गति की जरूरत होती है। अनुशासन मानकों के अनुपालन से आता है जबकि गति रचनात्मकता से निकलती है । रचनात्मकता ताज़ा अंतर्दृष्टि और जीवन व समाज में बेहतर प्रौद्योगिकी, समृद्धि और गुणवत्ता के लिए अग्रणी विचारों को बढ़ावा देती है। रचनात्मकता स्वायत्तता की अपेक्षा करती है—अनुशासन की कीमत पर भी सख्ती और कठोरता से मुक्ति।
जब स्थितियां बहुत ज्यादा बिगड़ती हैं, तो लोग महसूस करने लगते हैं कि अनुशासन को बहाल करने और बनाए रखने के लिए क्यों न सैन्य शासन स्थापित किया जाय । लेकिन दुनिया के विभिन्न हिस्सों में लंबे समय से सैन्य और कम्युनिस्ट तानाशाही रही पर कहीं भी ठीक से प्रगति नहीं हुई । जापान और अन्य जगहों पर यह देखा गया है कि वैज्ञानिकों और टेक्नोक्रेट के नेतृत्व में गठित प्रणाली अत्यधिक रचनात्मक होती है । दक्षिण कोरिया, ताइवान, हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर आदि की वैज्ञानिक राजनीति व्यवस्थाओं को दुनिया के नेता और बुद्धिजीवी अक्सर सैन्य तानाशाही समझने की त्रुटि करते रहे हैं ।     
एक अनुशासनवादी  समाज संबंधित समूह या प्रौद्योगिकी के मानदंडों, मानकों या नियमों और यहां तक कि परंपराओं/अनुष्ठानों/रीति-रिवाजों का पालन कर सकता है चाहे वह तटस्थ या विनाशकारी दिशा में हो। लेकिन इसमें सकारात्मक व प्रगतिशील दिशा का अभाव होता है।

भाग 6/8
वैज्ञानिक राजनीति क्रांति की अपरिहार्यता
अनाड़ियों व दलालों की पेशेवर  राजनीति भारत के लिए अभिशाप रही है। यह राष्ट्र की सभी समस्याओं के दुष्चक्र की जड़ों में है । राजनीतिक दलों के नेता अपनी मूर्ख बनाने की रणनीति के हिस्से के रूप में सिर्फ लंबे वादे, बड़ी-बड़ी  बातें करते रहे हैं । शीर्ष पर एक नेता काफी ईमानदार, बेदाग या श्रमसाध्य या चौकीदार हो सकता है, लेकिन यही चरित्र  इतनी आसानी से मध्यम और निचले ओहदों तक फैलेगी, ऐसा नहीं है, बल्कि अक्सर उल्टा होता है। आजादी के बाद से विकास के लिए कई बार अच्छी पहल सरकारों द्वारा की गई लेकिन दलालों की इस पेशेवर राजनीति द्वारा स्थापित लालच व अक्षमता ने  हमेशा चीजों को खराब किया है ।
लेकिन इन्हे ठीक करने हेतु भारत को पूर्ण सैन्य तानाशाही की जरूरत नहीं है हालांकि कई बार हालात बिगड़ने और व्यवस्था विफल होने पर लोग इसका समर्थन करने की मनःस्थिति में आ जाते हैं। लंबे समय के लिए सैन्य तानाशाही भयकारी अनुशासन तो बनाए रखता है आम जनता के बीच और सेना के निचले पायदान पर भी, लेकिन यह रचनात्मकता, पहल और प्रणाली में गतिशीलता को नष्ट कर देता है । अतः उच्चतर न्यायालयों और DST/CSIR/DRDO/वैज्ञानिक-तकनीकी समुदाय के संयुक्त निर्देशन में दो से तीन वर्षों के लिए सैन्य शक्ति की सुरक्षात्मक और प्रोत्साहक भूमिका दलालों व परिवारवादियों की पेशागत राजनीति को वैज्ञानिक राजनीति द्वारा प्रतिस्थापित करने के निमित्त समर्थन किया जा सकता है ।
अराजक और भ्रष्ट पेशेवर राजनीति और भाय वा क्षोभकारी सैन्य तानाशाही की दो चरम सीमाओं से अलग वैज्ञानिक राजनीति पूरी दुनिया में संतुलित और प्रगतिशील रास्ते के रूप में उभरी है । एक बार में ही जागरूकता और परिवर्तन की आवश्यकता है । अपनी नीतिगत अक्षमताओं को छिपाने के लिए बार-बार बस ऐतिहासिक गौरव का महिमामंडन  करने या इतिहास दोहराने से बेहतर विकल्प है वैज्ञानिक राजनीति ।  पेशेवर व परिवारी राजनेताओं और राजनीति का उन्मूलन  और हर जगह विशेषज्ञता और प्रतिभा को आगे लाना एक बिना जोखिम का लाभकारी खेल रहा है ।
1947 के बाद से जापान द्वारा अपनाए गए मॉडल को आंख बंद करके कॉपी करने की आवश्यकता नहीं है। उस समय तकनीकी क्रांति शैशवावस्था अवस्था में थी। लेकिन अब तकनीकी क्रांति पूरे शबाब पर है। इसके प्रकाश में और दुनिया भर में अनुभवों को देखते हुए भाग 1 में इंगित जापानी प्रतिरूप को और अधिक औपचारिक, सुरक्षित व अचूक तरीके से लागू करने की जरूरत है। अगर हम आसानी से अन्य क्षेत्रों में जापानी प्रौद्योगिकी और गुणवत्ता को स्वीकार करते हैं, तो राजनीति में ऐसा क्यों नहीं!
BUST--वैज्ञानिकों और टेक्नोक्रेट्स का यह निकाय भी प्रौद्योगिकी के अति उत्साह, अहंकार और आक्रामकता से पीड़ित हो सकता है और उन्नति के सूक्ष्म मानवीय, सामाजिक और नैतिक पहलुओं की अनदेखी कर सकता है । इस मुद्दे का प्रबंधन करने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय और कार्यात्मक स्तरों पर गैर-धार्मिक और गैर-सांप्रदायिक सामाजिक, पर्यावरणीय, कानूनी व शैक्षिक संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले मानद संघ को अदालतों के साथ समन्वय-निर्देशन में दबाव समूहों के रूप में काम करना चाहिए । इन संस्थानों को आगे सदविप्र बोर्ड (नैतिक विशेषज्ञों के बोर्ड) के रूप में औपचारिक रूप दिया जा सकता है। ऐसे निकायों को वैज्ञानिक आध्यात्मिकता और व्यावहारिक ज्ञान के आधार पर नैतिक सक्रियता लेनी चाहिए।

भाग 7/8
वैज्ञानिक राजनीति के लिए संवैधानिक और कानूनी सुधार

पूर्व वर्णित वैज्ञानिक राजनीति क्रांति के लिए निम्नलिखित संवैधानिक व कानूनी सुधारों की अपेक्षा है:
1) राष्ट्रीय, सरकारी और औद्योगिक जीवन में केवल BUST द्वारा नेता के रूप में चयनित वैज्ञानिकों या शोधकर्ताओं के प्रवेश  की अनुमति दें । इन वैज्ञानिकों या शोधकर्ताओं को सभी नागरिक वैज्ञानिकों या शोधकर्ताओं में से राष्ट्रीय जीवन के लिए नेताओं के रूप में उक्त संवैधानिक निकाय द्वारा चुना जाएगा जिनकी क्षमता, योगदान और अनुभव स्थापित है और भ्रष्टाचार या निम्न चरित्र के लिए दागी नहीं हैं ।
2) जातिपहचान को समाप्त करने के लिए भाग 4 में उल्लिखित कानूनी सुझावों को लागू किया जाना चाहिए।
3) किसी भी दागी पदाधिकारी, जिसके खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप निर्धारित हो जाते हैं, को वापस बुलाने के लिए recall का संवैधानिक प्रावधान स्थापित करें ।
संवैधानिक सुधार आमतौर पर लोकतंत्र पर निर्भर नहीं होते । बल्कि लोकतंत्र संवैधानिक सुधारों का अनुसरण करता है । मत भूलें, भारत में संविधान को 1949-50 में पहली बार आया था जबकि लोकतंत्र 1951-52 में आया था।   

भाग 8/8
वैज्ञानिक राजनीति के स्थापन के लिए क्या सैन्य समर्थन युक्त क्रांति सबसे अच्छा तरीका है?
अब असल मुद्दा यह है कि दलाल पेशेवर/भाई-भतीजावादी राजनेताओं के चंगुल से राष्ट्र को निकालने और वैज्ञानिक राजनीति क्रांति की स्थापना के इस कार्यक्रम को कैसे लागू किया जाए ! यह कार्य देखने-सोचने में जटिल, पर वास्तव में सरल है। मेरे विचार से , तीन स्पष्ट विकल्प उपलब्ध हैं:
I) इस कार्यक्रम को प्रचंड बहुमत प्राप्त वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा लागू किया जा सकता है । लेकिन, क्या इसे उचित कौशल और ईमानदारी के साथ लागू किया जा सकता है जब अधिकांश निर्वाचित नेता पेशेवर और भाई-भतीजावादी राजनेता हों । इसके लिए सरकार द्वारा बहुत उच्च राजनीतिक इच्छाशक्ति और बलिदान की भावना की आवश्यकता होगी ।
II) दूसरा रास्ता यह है कि एक नागरिक के रूप में हम भारत के राष्ट्रपति से खुली अपील कर सकते हैं कि वे देशहित में राज्य-व्यवस्था के सभी वर्गों के समर्थन की अपेक्षा के साथ राष्ट्रीय सरकार के माध्यम से इसके लिए उपाय करें । लेकिन, पेशेवर और भाई-भतीजावादी राजनेताओं के प्रतिरोध को निपटाने के लिए बहुत उच्च राजनीतिक इच्छाशक्ति का मुद्दा यहां भी उठता है ।
III) तीसरा तरीका यह है कि वैज्ञानिक समुदाय उच्चतर न्यायालयों और नैतिकतावादी संस्थाओं के समर्थन (जैसा कि पहले संकेत दिया गया है) सहित ऐसे कार्यक्रम और संवैधानिक/कानूनी परिवर्तनों के लिए 2-3 वर्षों के लिए सेना का सुरक्षात्मक और प्रोत्साहनकारी  समर्थन ले । हालांकि सेना मूल रूप से अपने नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई के लिए नहीं हैं, लेकिन पेशेवर/भाई-भतीजावादी राजनेताओं को, चाहे वह निर्वाचित हों या नहीं, राष्ट्र और लोकतंत्र के वास्तविक शत्रु हैं, क्योंकि मुख्य रूप से वे प्रगति की धीमी और दोषपूर्ण गति, वितरण में असमानताओं, मूल्यों में ह्रास और इस देश की संकट-आयामी अक्षमता के लिए जिम्मेदार हैं । इसलिए, अगर वे इस कार्यक्रम के लिए कोई प्रत्यक्ष या छिपा प्रतिरोध डालते हैं तो उनके खिलाफ सशस्त्र बलों का उपयोग करने में संकोच करने की कोई जरूरत नहीं है । यह राष्ट्र के हित में है कि ये दलाल पेशेवर/भाई-भतीजावादी राजनेता अपनी सभी शक्तियों को वैज्ञानिक राजनीति क्रांति के लिए, स्वेच्छा से या अनिच्छा से, समर्पित कर दें ।
पहले दो उपायों के बारे में एक बुनियादी प्रश्न यह है कि क्या ऐसे पेशेवर राजनेता सुधारों को प्रभावी ढंग से काम करने देंगे, अब तक के नकारात्मक अनुभवों के आलोक में,  विशेष रूप से 1985-1991 के दौरान, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है? यदि इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक है, तो तीसरा तरीका ही एकमात्र प्रभावी उपाय बचता है।
यह एक अच्छे बहुमत वाली सरकार पर निर्भर करता है कि वह इस ऐतिहासिक अवसर का अपने दम पर उपयोग करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति विकसित करे या सैन्यीकृत समाधानों की प्रतीक्षा करे । अन्यथा, 01 दिसंबर, 2019 को एक समाचार चैनल पर यूपी के पूर्व डीजीपी श्री विक्रम सिंह की एक टिप्पणी बेकार नहीं है: राष्ट्र अब रक्त चाहता है ।
ये सुधार न केवल भारत के लिए बल्कि दुनिया में कहीं भी किसी भी लोकतंत्र के लिए प्रासंगिक हैं जो पेशेवर/भाई-भतीजावादी राजनेताओं से ग्रस्त हैं ।      यदि आप सहमत हैं तो अधिक से अधिक शेयर/अग्रेषित करें।
डा0 आर पी सिंह
प्रोफेसर, वाणिज्य विभाग,
दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय,
गोरखपुर

Wednesday, 6 November 2019

🌷हिन्दी नहीं, हिंदुस्तानी भाषा🌷



वैसे हर भाषा की अपनी खूबियां होती हैं। अनेक लोग मानते हैं कि उर्दू जुबान सीखे हुए का लफ्ज़ दर लफ्ज़ स्पष्ट होता है और यह दावा निराधार नहीं है। असल में अरबी जुबान वालों ने भारत में घुसने के बाद अनुभव किया कि उनकी जुबान में लब्ज स्पष्ट नहीं हो पाते यथा उनके यहॉ ‘स’ और ‘ह’ में, ‘ब’ और ‘प’ में अन्तर नहीं है । इससे भारत में फौज के सिपाहियों को  निर्देश देने में भ्रम होता था, वे फौजी जो नाममात्र के पढ़े-लिखे होते थे पर प्राकृत व संस्कृत के शुद्ध उच्चारण परम्परा के अभ्यस्त थे। अतः वर्दी वालों के लिए जुबान बनी वही भाषा अरबी फारसी लिपि (जो कि अरबी लिपि का ही विस्तार है) में लिखे जाने पर उर्दू कहलाती और देवनागरी में लिखे जाने पर हिंदवी कहलाती थी। अपनी सुन्दरता, सरलता व स्पष्टता के चलते यह आगे चलकर साहित्य, अदालत व दरबारों में भी अति लोकप्रिय हुई। भारत में 200 साल पहले हिंदवी/हिंदुस्तानी बोली जाती थी। पर ब्रिटिश काल में `जब फूट डालो और राज करो’ के तहत संस्कृतनिष्ठ व अरबी-फारसी प्रभाव की फिरकापरस्ती शुरु हुई तो हिन्दी और उर्दू अलग हो गयीं। वास्तव में उर्दू जबान का मजहब से कभी लेना-देना नहीं था। यह कमाल तो मनबढ़ साम्प्रदायिक ताकतों का है।
ब्रिटिश सरकार ने हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने के लिए अपने चापलूसों द्वारा हिन्दी-उर्दू का झगड़ा शुरू कराया जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व  न्यायाधीश मार्केण्डेय काटजू ने हाल ही में हिन्दी दिवस पर उल्लेख किया था। काटजू की काफी आलोचना हुई थी, किन्तु काटजू यहाँ गलत नहीं हैं। सांप्रदायिक मानसिकता ने फालतू बखेड़ा शुरू किया--संस्कृतनिष्ठ हिन्दी हिंदुओं की  और अरबीनिष्ठ उर्दू मुसलमानों की। इसका नतीजा बँटवारे में बदला और आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया भुगत रही है। इस गलती का परिष्कार करना होगा। हिन्दी-उर्दू के स्थान पर हिन्दुस्तानी को पुनः स्थापित करें—राष्ट्रभाषा नहीं, राष्ट्रीय संपर्क भाषा के तौर पर, अंग्रेजी व संस्कृत के साथ। वैसे भी हिन्दी तक राजभाषा ही है, राष्ट्रभाषा नहीं बन पायी। राष्ट्रभाषा की अवधारणा संकीर्ण है, गलत है। चाहे उत्तर भारत हो या दक्षिण, पश्चिम भारत हो या पूरब किसी एक भाषा को जबरिया थोपना उचित नहीं है।
हिन्दी व उर्दू को पृथक भाषा मानना अनावश्यक भार बढ़ाना ही है।
(आग्रहः यदि सहमत हैं तो अधिक से अधिक शेयर करें।)
🙏प्रोफेसर आर पी सिंह
दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय💐

Friday, 12 July 2019

भोजपुरी विरोध: भ्रांतियाँ एवं तथ्य


🎷कतिपय बुद्धिजीवी अज्ञानतावश भोजपुरी के विरोध पर उतारू हैं। भोजपुरी का दुर्भाग्य रहा है कि इसके समर्थक और विरोधी दोनों ही भोजपुरी को भाषा में सीमित कर परस्पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं। पर छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना, विदर्भ, सौराष्ट्र, उत्तराखंड या बुंदेलखंड की ही भांति भोजपुरी भी क्षेत्र की पहिचान, राज्य, संस्कृति, स्वाभिमान तथा विकास ही मुद्दा है भाषा का नहीं। फिर भी अगर लोग इसकी प्रबल अभिव्यक्तिगत क्षमता का मर्यादित उपयोग करते हैं तो इसमें कोई हर्ज़ नहीं है।
भाषा की आड़ में असली मुद्दे पीछे हते रहे हैं। कुछ वर्षों तक अनेक लोग भाषा भोजपुरी, राज्य पूर्वाञ्चल का प्रचार करते रहे। इन लोगों ने बड़ी चतुराई से पहिचान व प्रदेश से हटाकर भोजपुरी को भाषाई हथियार बना दिया। ऐसे लोग भी कम नहीं है जो भोजपुरी प्रायः तब बोलते हैं जब किसी मजदूर या रिक्शावाले को मजदूरी भुगतान में दबाना होता है। भोजपुरी इनके लिए शोषण का ही जरिया रहा है। पर यह विकासोन्मुख समाज आंदोलन के लिये ठीक नहीं है।  
🎷भोजपुरी भाषा का नहीं बल्कि इस क्षेत्र व जनता की संस्कृति, पहिचान, आत्मविश्वास तथा विकास का व्यापक विषय है। ठीक जैसे तेलंगाना व आन्ध्र दो भिन्न पहिचान व संस्कृतियां हैं भले ही भाषा तेलुगू है। पर भाषा में सीमित कर भोजपुरी संस्कृति ही नहीं इस क्षेत्र व जनता को भी लम्बे समय से काफी क्षति पहुंचाई गयी है, भले ही भाषा के व्यवसायियों ने भोजपुरी अभिव्यक्तियों में अश्लीलता परोसकर खूब लाभ कमाया हो।
🎷यदि कुछ लोग प्राइमरी से विश्विद्यालय स्तर तक भोजपुरी के माध्यम से शिक्षण की अपेक्षा करते हैं तो यह समय के पहिए को पीछे ढकेलना ही होगा। पर भोजपुरी की भाषागत सामर्थ्यं का साहित्य, फिल्म या अभिव्यक्तिगत व्यवसायों में मर्यादित उपयोग इस बहाने से नहीं  रोका जा सकता कि इससे हिन्दी कमजोर हो जाएगी। और भोजपुरी की यह सामर्थ्य तो सिद्ध हो चुकी है। संविधान की आठवीं अनुसूची में  शामिल करने से भोजपुरी के इस सामर्थ्य-उपयोग में निश्चित ही और मदद मिलेगी। वैसे गोरख, भर्तृहरि, कबीर की क्रांतिकारी भाषा कभी राज्याश्रय की मोहताज नहीं रही है।   
🎷कुछ लाख सिन्धी शरणार्थियों की सिन्धी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से गुजराती भाषा को आजतक खतरा पैदा नहीं हुआ। फिर भोजपुरी को मान्यता देने से हिन्दी कमजोर नहीं होगी बल्कि और समृद्ध ही होगी। हिन्दी को असली खतरा तो अंग्रेजी से है, भोजपुरी, मैथिली, मगही, अंगिका आदि से नहीं। यह भी सच है कि भाषा को संवैधानिक मान्यता मिल जाना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। मैथिली व सिंधी इस बात के उदाहरण हैं। स्वयं हिन्दी राजभाषा की संवैधानिक मान्यता के बावजूद 72 वर्षों में राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। वैसे राष्ट्रभाषा की अवधारणा ही दोषपूर्ण और घातक है। दो-तीन भाषाओं को राष्ट्रीय संपर्क भाषा तथा इसी तरह राज्यों में प्रांतीय संपर्क भाषा का उपयोग बेहतर है। भोजपुरी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलने से इस क्षेत्र का सम्मान बढेगा। यहां की जनता में आत्मविश्वास व विकास का भाव बढ़ेगा तथा उनमें हीनता तथा नकारात्मकता समाप्त होगी।
🎷 भोजपुरी पहिचान व राज्य का मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय संबन्धों के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है। नेपाल के 10 जिलों में (4 जिलों में खाँटी) भोजपुरी बोली जाती है। फिर मारिशश, सूरीनाम, फ़िजी आदि 14 देशों का सांस्कृतिक आधार ही भोजपुरी है, भाषा भले ही कुछ भी हो। अतः भोजपुरी भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का महत्वपूर्ण घटक है। इसकी उपेक्षा मूर्खता है।          
🎷 प्रगतिशील समाजवाद दर्शन के प्रणेता श्री प्रभात रंजन सरकार का ही कथन है “भविष्य में भाषागत व सांस्कृतिक विमिश्रण से जैसे-जैसे विभिन्न समाज नजदीक आते जाएंगे दक्षिण पूर्व एशिया एक समाज में बदल जाएगा।" (सामाजिक – आर्थिक समूहीकरण, कणिका में प्रउत, भाग 13, 1979) तब भाषा व संस्कृति भेद तो समाप्त हो जाएगा लेकिन प्रशासनिक कुशलता, विकास, पहिचान, विरासत, विविधता व रोचकता के नजरिए से तेलंगाना, आंध्र, तमिल, बंगाल, छत्तीसगढ़, पंजाब की भांति एक उचित आकार के कुशल राज्य के तौर पर पृथक भोजपुरी, अंगिका, विदर्भ, सौराष्ट्र की प्रासंगिकता तो हमेशा बनी रहेगी।
🎷जब 13 जिलों और 60 लाख की आबादी पर हिमाचल और उत्तराखंड बनाए जा सकते हैं, 18 जिलों पर झारखंड बन सकता है तो 27 जिलों के बृहत्तर क्षेत्र पर भोजपुरी क्यों नहीं?
🎷राज्य के नाम व राजधानी का मुद्दा भी जनता जनार्दन के कालगत रुझान पर छोड़ देना चाहिए। वैसे तो इसके लिए भोजप्रांत, भोजभूमि, भोजखण्ड, भोजांचल, काशीराज जैसे कई अच्छे नाम सामने है।
🎷पूर्वांचल शब्द शब्द सुनने में भले ही अच्छा लगे पर अवधारणा गलत है क्योंकि यह किसी भी तरह भारत के पूर्वी हिस्से में नहीं आता। फिर इलाहाबाद व आसपास के क्षेत्र तो अवधी में आते हैं।
🎷 जो कथित महान लोग भोजपुरी राज्य या भाषा की संवैधानिक मान्यता का विरोध कर रहे हैं इस क्षेत्र के प्रति अपनी चिरविद्यमान हीनमन्यता, शोषवृत्ति तथा आत्मविश्वास, समझ व सूझ की कमी के चलते वे ऐसा करने को बाध्य हैं।
जन भोजपुरी मंच तथा हिन्दी बचाओ मंच, दोनों ही गलत और भ्रामक तथ्यों द्वारा सबको गुमराह कर रहे हैं। हिन्दी बचाओ मंच के हवाले से बताया जा रहा है कि भोजपुरी भाषा में रामचरितमानस, पद्मावत, सूरसागर जैसा एक भी ग्रंथ नहीं है। पर गोरख, भर्तृहरि, कबीर जैसे निर्भीक, अध्यात्ममुखी रचनाकार तथा महाकवि घाघ जैसे वैज्ञानिक साहित्यकार दूसरी भाषाओं में कहाँ मिलते हैं! हरेक की अपनी खूबियाँ है। ऐसी ही तमाम बचकानी दलीलें दोनों तरफ से दी जा रही हैं। पर दोनों ही भोजपुरी को केवल भाषा का मुद्दा बनाए रखने पर तुले हैं।  दोनो ही भारत के प्रधानमंत्री तक को बकवास लिखकर भेज रहे हैं।
🎷 पाली भाषा 2500 वर्षों पूर्व बुद्ध के काल में चलती थी। आज यह प्रचलन से बाहर होते हुए भी विश्वविद्यालयों में अध्ययन व शोध का विषय है। बौद्ध तथा जैन साहित्य को ठीक से समझना है तो पाली जानना आवश्यक है। पाली किसी राजनेता की  मांग पर नहीं बल्कि अकादेमिक आवश्यकता के चलते पढ़ाई जाती है। यही बात भोजपुरी पर भी लागू होती है।    
🎷 भोजपुरी बोलने और लिखने में ही भोजपुरी का सम्मान है, यह संकीर्ण नज़रिया भोजपुरी आंदोलन को बर्बाद करता रहा है। इसको बदलना होगा। भोजपुरी को इस क्षेत्र व यहाँ की जनता के पहिचान, स्वाभिमान और विकास का मुद्दा बनाना होगा।

प्रोफेसर रवि पी सिंह
दी द उ गोरखपुर विश्वविद्यालय एवं
केन्द्रीय प्रशिक्षण सचिव, प्रगतिशील भोजपुरी समाज, वाराणसी

Saturday, 25 May 2019

#NEW GOVERNMENT: POLICY EXPECTATIONS# //नई सरकार: नीतिगत अपेक्षाएँ//

राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आती और जाती रहती हैं; सरकारें बनती और बिगड़ती रहती हैं लेकिन कतिपय राष्ट्रहित के ऐसे मुद्दे हैं जो दीर्घकालीन प्रभाव के हैं और जिन की लगातार उपेक्षा के चलते आज भारत समय के एक विषम मोड़ पर खड़ा है। हम दुनिया के प्रगति की दौड़ में काफी पीछे हैं। यूरोप और अमेरिका को तो आज के उन्नत मुकाम पर पहुंचने के लिए दो-तीन सौ साल का समय मिला किंतु भारत के लिए वर्तमान समय काफी चुनौतीपूर्ण है। लोकसभा के चुनाव के परिणाम के बाद नयी सरकार को शुभकामनायें। इस सरकार के समक्ष कई बड़ी चुनौतियाँ मुह बाए खड़ी हैं। अर्थव्यवस्था मंदी की और लुढ़क रही 2-3 फीसदी की गिरावट के साथ। काले धन, भ्रष्टाचार का कारगर इलाज अभी बाकी है। कोई फर्क नहीं पड़ने वाला चाहे सत्ता में कोई बैठा हो, यदि व्यवस्था को दीमक की भांति खोखला कर रहे इन मुद्दों का समाधान नहीं हुआ। नोटबंदी और बेनामी भू-संपत्ति नियंत्रण जैसे उपाय तो बचकाने ही साबित होते रहे हैं। इन से न तो काले धन की समस्या कम होने वाली है न भ्रष्टाचार, न आतंकवाद को कम किया जा सकता है और न तीव्र व स्थिर विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है। नोटबंदी और जमीन की सीलिंग को तो पूर्व में कांग्रेस की सरकारों द्वारा अपनाए गए। और मोदीजी की नोट बंदी तथा बेनामी संपत्ति के उपाय तो प्रकारांतर से कांग्रेस की परंपरा के विस्तार मात्र है। जीएसटी अवश्य समयानुरूप कदम है।
काले धन और भ्रष्टाचार के समाधान की वास्तव में यदि मंशा है तो सरकार को सात काम अवश्य करने होंगे:
1) व्यक्तियों व सहकारी समितियों तथा गैर कंपनी संस्थाओं पर आयकर समाप्त कर देना होगा, इससे काले धन व भ्रष्ट्चार का सबसे बड़ा जरिया ही समाप्त हो जाएगा। और जो धन अनाप-शनाप के कार्यों तथा खर्चीली पार्टियों में अधिकारियों-नेताओं को खुश करने पर खर्च होता है, उसका उत्पादक उपयोग होने से उत्पादन बढ़ेगा और बिना कोई कर बढ़ाए ही अन्य प्रकार के करों से वसूली हो जाएगी, मुख्यतः जीएसटी, सीमा कर और LVT से कलेक्शन स्वत: बढ़ जाएगा; तथा रेवेन्यू कलेक्शन अधिक बढ़ने पर कंपनियों पर भी आयकर समाप्त किया जाना बेहतर होगा।
नीतिसार है: अर्जित आय पर आयकर समाप्त कर दें ताकि कालाधन बाहर आकर उत्पादन व समृद्धि में लगे। उत्पादन व अर्जन नहीं, उपभोग के बिन्दु पर कर लगे, हस्तांतरण पर शुल्क और प्रदूषण के बिन्दु पर अर्थदण्ड।
2) जमीन की हदबंदी के कानूनों को भूमि मूल्य कर [Land value tax (एलवीटी)] से प्रतिस्थापित कर देना होगा। पूर्व में आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन तथा हदबंदी के कानून लागू किए गए। इन कानूनों के जरिए छोटे जमींदारों और बड़े किसानों को शोषक बताकर, उन्हें बदनाम कर उनकी जमीन तो सीलिंग के दायरे में ला दी गयी। पर, बड़े जमींदारों को इससे बचाने के लिए इन कानूनों में अपवाद डाल दिये गए; यथा-चाय, रबड़, काफी, मसाले आदि के बागानों, गन्ने के फार्म, मत्स्य पालन के तालाबों को इन कानूनों से मुक्त रखा गया, इस बहाने की ऐसा करने से राष्ट्रीय उत्पादन में काफी गिरावट आ सकती है। ये बड़े जमींदार वर्चस्ववादी व सत्ताशाली लोग थे।
पर ऐसे अपवाद गलत थे। राष्ट्रीय उत्पादन प्रभावित ना हो इसके लिए सहकारी अथवा सरकारी खेती को सदस्य संख्या के अनुपात में भूमि के सामूहिक उपयोग की छूट देकर के ऐसा किया जा सकता था। वास्तव में एक आकार से अधिक बड़ी जमीनों पर भूमि मूल्य कर लगाकर भूमि के उपयोग की कुशलता को काफी बढ़ाया जा सकता है। भूसम्पदा मूल्य कर लगाने पर हदबंदी के कानून हटा दें। वैसे भी किसानों पर तो हदबंदी लागू हुई, पर उद्योगपतियों व अमीरों पर नहीं। भूसम्पदा मूल्य कर अमीरी रेखा का काम करेगी, गरीबी रेखा की भांति ।
नीतिसार है: मंहगी व बड़ी जमीनों (बेनामी या सनामी) पर सर्किल वैल्यू के 1% वार्षिक दर से भूसम्पदा मूल्य कर लगाया जाय।
3) बैंकिंग लेनदेनों पर नकद लेनदेनपर निर्धारित कर की अपेक्षा आधे या दो तिहाई के बराबर कर लगाया जा सकता है जैसा कि छोटे कारोबारियों के ऊपर आयकर निर्धारण के तौर पर हो चुका है।
ये तीन उपाय ही अर्थव्यवस्था की कुशलता को बढ़ाने के लिए काफी उपयोगी हैं ऐसे ही उपायों को अपनाकर खाड़ी के आठ देशों, दुबई, अबू धाबी आदि ने 10-15 वर्षों में उन्नति के मुकाम हासिल किए और इनहीं को हमें भी निष्ठापूर्वक अपनाना होगा। बचकाने उपायों से अर्थव्यवस्था को कोई निश्चित गति और दिशा नहीं मिलने वाली।
4)भाषाई आधार पर राज्यों के सन 1956 के पुनर्गठन को भंग कर नए सिरे से राज्यों व समाजों का पुनर्गठन कर समाजार्थिक व प्रशासनिक कुशलता वास्तविक अर्थों में बढ़ई जाय। उन्हीं इकाइयों को राज्य का दर्जा मिलना चाहिए जिसका आकार भारत के सम्पूर्ण भूक्षेत्र के 5% या सम्पूर्ण आबादी के 5% से कम न हो। किन्तु विविधता के समुचित सम्मान व उपयोग हेतु इससे कम आकार के समूहों को भावनात्मक-सांस्कृतिक विरासत व प्राकृतिक-भौगोलिक स्थिति व संभावनाओं तथा अपेक्षाओं के आधार पर पृथक पहिचान एवं स्वायत्त सामाजिक-आर्थिक नियोजन व विकास से तौर पर एक राज्य के भीतर अनेक समाजों का गठन कर दिया जाय। कश्मीर, जम्मू, हिमाचल, लद्दाख व उत्तराखंड (काजाहिलू) पर भी यही नीति चलेगी। धारा 370 को हटाने न हटाने से ज्यादा लाभ नहीं है। यह तो केवल सभी राज्यों को समान दृष्टि से देखने का जरिया है।
विविधताओं का ही उपयोग कर अमेरिका आज सभी पर हावी है। कुल मिलाकर विविधताओं का आदर और वैज्ञानिक उपयोग परोक्ष रूप से ही सही पर विकास-वृद्धि पर गहरा असर डालते हैं।
5) देश को मन्दिर – मस्जिद में उलझाने के बजाय विश्व जनमत को साथ लेकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तथा मानव धर्म (भागवत धर्म) की ओर आगे बढ़े।
6) इस स्पष्ट जनादेश का सम्मान करते हुए राष्ट्रहित में बुलंद निर्णय लें।
7) हिंदू अविभाजित परिवार, हिन्दू उत्तराधिकार क़ानून, हिन्दू विवाह क़ानून जैसे भेदभावयुक्त सांप्रदायिक अवधारणाओं को बदला जाय। किसी भी तरफ के अतिवाद, कट्टरपन व सनक से बचें।
राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र हित की बात करना या दिखावा करना एक बात है लेकिन राष्ट्र के विकास और राष्ट्रीय हितों को कुशलता से आगे बढ़ाना बिल्कुल अलग मामला है।
🎷यह मीडिया के लिए भी मौका है कि वह सरकारों को संकीर्ण मुद्दों में उलझाने के बजाय विकासमुखी बनने दे।
***जय भोजप्रान्त, जय भोजपुरी***
प्रोफेसर आर पी सिंह
प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Saturday, 18 May 2019

//गांधी को समझना कठिन है, पर जरूरी है//


कट्टरपंथियों के बस का नहीं है कि वे महात्मा गांधी को समझ सकें। नाथूराम गोडसे देशभक्त थे या नहीं यह तो इसी बात से समझा जा सकता है कि उनके कृत्य से कांग्रेस पर कब्जा जमाये सामंतों तथा बड़े जमींदारों का काम बहुत आसान हो गया था। गांधी उनके लिए राह का रोड़ा बने हुए थे। गोली ही मारनी थी तो उसे मारना चाहिए था जिसके नेतृत्व में रजवाड़ों-सामंतों- जमींदारों की तिकड़ी देश को हड़पने का कुचक्र चल रही थी। गांधी ने तो आज़ादी के तुरंत बाद कांग्रेस को भंग कर दलविहीन लोकतन्त्र का आह्वान किया था। उन्हें इस बात का भान हो चुका था कि कांग्रेस पार्टी इस परिवारवादी और भ्रष्ट्र तिकड़ी के चंगुल में फँसकर विकास की गति को अकुशल व धीमा कर देगी। आम जन की तरक्की बेहद कठिन हो जाएगी।
जिस बात को लेकर सुभाष चन्द्र बोस ने सन 1939 में प्रांतीय सरकारों के गठन के समय जनप्रतिनिधियों के लोभी व सुविधाभोगी आचरण को लेकर गांधी को चेतावनी भरे पत्र लिखे थे उससे गांधी देर से ही सही, सहमत हो चुके थे (वास्तव में गांधी और सुभाष के मध्य वैचारिक मतभेद मुख्यतः इसी बात को लेकर थे कि  उत्साही सुभाष की अनेक बातों से गांधी तुरंत सहमत होने में असहज होने लगते थे और सुभाष को समय गवाना पसंद नहीं था।) गांधी यह भी समझ रहे थे कि अलग अलग दलों में बंटे अनुयाई/समर्थक विचारधारा की आड़ में अपने दल व नेता की गुलामी करेंगे (कोमल शब्दों में भक्त बनेंगे), न की अपनी अंतरात्मा की  आवाज पर चलेंगे। विचारधारा की बात व्यवस्था को ताज़ी और पहले से बेहतर दिशा देने के लिए की जानी थी। पर सत्तालोलुप  राजनेता अपने उन्माद, सनक, पागलपन, अतिवादी कट्टरपन तथा वैमनष्य के जरिये स्वार्थसाधन को ही विचारधारा के रूप में पेश करने लगे।  गलत, दूषित, दक़ियानूसी या अधूरी-असंतुलित विचारधारा से बेहतर है, विचारधारा हो ही नहीं। अतः गांधी ने दलविहीन लोकतन्त्र की बात की जिसमें जनप्रतिनिधि अपनी सेवा, व्यवहार व काबिलियत के आधार पर चुन के विधायिका में पहुंचेंगे, न कि पार्टी की हवा, गुलामी, पैसा और शराब की बदौलत। आज हम देख रहे हैं कि सभी दलों के राजनेता सार्वजनिक तौर पर तो राष्ट्र ही सर्वोपरि का एलान करते हैं पर वास्तविक व्यवहार में पार्टी और परिवार ही सर्वोपरि चलता है। ऐसे में गांधी का सोचना गलत तो नहीं था। इसीलिए टैगोर, सुभाष से लेकर प्रभात रंजन सरकार तक ने भी दलविहीन को ही उचित माना है।
गांधीजी को ईश्वर की भांति आलोचना से परे रखने की आवश्यकता नहीं है। वे प्रयोगवादी व्यक्ति थे, अपने जीवन को ही उन्होंने सत्य के साथ प्रयोग माना था। गलतियाँ उनसे भी हुई थीं। पर वे अच्छे मनुष्य थे। उनकी हत्या एकदम गलत थी। विभाजन के लिए गांधी को दोषी मानना या उन्हें पाकिस्तान का जनक कहना गलत है। विभाजन के लिए दोनों तरफ के वे कट्टरपंथी, हिंसा मनोवृत्ति व मनभेद बढ़ाने वाले ही असली ज़िम्मेवार थे, जो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति में जाने-अनजाने मददगार बन रहे थे।
 गांधी की आकस्मिक हत्या  के चलते देश में लोकतन्त्र के स्वाभाविक विकास की प्रक्रिया बाधित हो गयी। देश इसी तिकड़ी में फँसकर भ्रष्टाचार और निकम्मेपन का शिकार हुआ, जिसके विरोध में गणतन्त्र के बाईस वर्ष बाद ही जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में सम्पूर्ण क्रांति का आंदोलन चलाना पड़ा। 
यह अच्छी बात है कि माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी इस मुद्दे पर कट्टरपंथ से परे समझदारी से चलते रहे हैं। वे भलीभाँति जानते हैं कि गांधी पूर्णपुरुष न होते हुए भी गुजरात ही नहीं, पूरी दुनिया के सामने भारत का गौरव हैं।
****प्रोफेसर आर पी सिंह
प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Sunday, 2 December 2018

बंटवारे पर बदलें बचावी विदेशनीति, तभी अमन चैन


👉करतारपुर कोरिडोर के उद्घाटन अवसर पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री द्वारा श्रीयुत इमरान खान द्वारा कुछ विवादित मुद्दों के उल्लेख को अनावश्यक, नकारात्मक व चिंताजनक मानना भारी नीतिगत भूल है। मोहम्मद इमरान खान के अनेक अवसरों पर विवादों पर दिए गए ऐसे बयान भारत को अच्छा अवसर प्रदान कर रहे हैं जिनकी इस देश का भावुक नेतृत्व बार बार अनदेखी किए जा रहा है। बर्लिन की दीवार तो बनने के तीस सालों बाद ही  1991 में ही ढहा दी गयी। कश्मीर, खालिस्तान, बलूचिस्तान, सिन्ध आदि की समस्याओं का समाधान यही है कि 1947-48 के भारतीय उप महाद्वीप के विभाजन की राजनीतिक व मानसिक दीवारों को तो ढहा ही दिया जाय।
👉बंटवारे के बाद इकहत्तर सालों में यदि पाकिस्तान पश्चिमी यूरोप के छोटे देशों की भांति समृद्ध व खुशहाल हो गया होता और भारत खस्ताहाल रह गया होता तो मान लेते कि बंटवारा सही कदम था। पर भारत की अपेक्षा आबादी का आधा घनत्व रखने वाले पाकिस्तान को वहां के नेतृत्व ने जिस तरह बार बार गुमराह कर उसे खस्ताहाल और दीवालिएपन की हालत में पहुंचा दिया, यह साम्प्रदायिक आधार पर भारत के विभाजन को एकदम गलत साबित करता है। अतः द्विपक्षीय व वैश्विक स्तर पर सभी सम्पर्कों में दुनिया में आतंकवाद व अशांति के समाधान के लिए विभाजन की दीवार को गिराना पहली राजनीति व कूटनीतिक प्राथमिकता होनी चाहिए। इन्सान मंगल और बृहस्पति पर पहुंच जा रहा है तो विभाजन का निरस्तीकरण असम्भंव तो नहीं है। जो विभाजन  सत्तर सालों से विश्वशांति के लिए खतरा बना हुआ है, जो अल-कायदा, तालिबान, लश्कर और ISIS के उदय का निमित्त है उसके निरस्तीकरण में ही देश और दुनिया की भलाई है।
👉भारतीय नेतृत्व को ऐसे अवसरों को हर मंच पर खूब भुनाना चाहिए भले ही अवसरवादिता का तमगा लगे। भारतीय नेतृत्व को चाहिए कि अमन चैन के इच्छुक सभी देशों पर दबाव बनाए कि पाकिस्तान की एक संम्प्रभु राष्ट्र की मान्यता समाप्त करें और भारत सरकार को यह कदम पहले ही उठा लेना चाहिए। भारत के नक्शे में पाकिस्तान को अपने देश का अभिन्न पर बाधाग्रस्त क्षेत्र/disturbed area दिखाना चाहिए ताकि विवाद पैदा कर बारम्बार सफाई दी जाय कि बिना ऐसा कदम उठाए दुनिया में शांति और सौहार्द्र की बातें खोखली हैं। एक स्वतंत्र पाकिस्तान के बने रहना दुनिया के अमन चैन के लिए सबसे बड़ा खतरा है। भारत के विदेश नीति व सैन्य नीति बचाव की मुद्रा में रखने की जरूरत नहीं है।
👉इमरान भारत के अच्छे दोस्त हैं और हमें बात को हर कहीं ले जाने का अच्छा अवसर दे रहे हैं। भारत में शांति होगी तो ही दुनिया में शांति स्थापित हो सकेगी।
🙏यदि आप इस सन्देश से सहमत हैं तो इसे अधिक से अधिक शेयर करें।
💐डा० रवि प्रताप सिंह, आचार्य, दी. द. उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय एवम् प्रगतिशील भोजपुरी समाज

Friday, 19 January 2018

Rape--The Alcohol Connection

इस तरह की ठंड में दारू और चिकन का संयोजन ऐसा गुल खिलाता रहा है कि इनका सेवन कर अपराधी मासूम बच्चियों का अपहरण कर हाईवे पर दरिंदगी कर रहे हैं और बहुत से नशेड़ी साधु-संत अपने आश्रमों में। पर साधू – सन्तों के बैशाखी वाली सरकार पूरे देश में नशाबन्दी लागू करने में हिचकती रही है, क्या महज इसलिए कि बहुतेरे साधू संन्यासी भी नशाखोर रहे हैं। बडी़ बडी़ बातें करने वाली ‘बेटी बचाओ’ सरकार गुजरात और बिहार में नशाबन्दी लागू कर सकती है पर पूरे देश में नहीं, क्या यह मोदी सरकार का दोगलापन नहीं है। यदि पूरे देश में नशाबन्दी लागू हो जाय तो दारू और चिकन का; ठेकेदार, अधिकारी, पूंजीपति और नेता का गठजोड़ कमजोर पड़ेगा और घृणित अपराध, भ्रष्टाचार और साधनों की बरबादी काफी कम हो जाएंगे, यह बात मोदी-योगी को क्यों नहीं समझ आती! इसके लिए तो यदि संसदीय दलतंत्र ही नहीं लोकतंत्र की बलि भी देनी पड़ जाय तो कोई हर्ज नहीं 
सार्वजनिक स्थानों पर नशाबन्दी (कच्ची और पक्की दोनो) से जनचेतना के साथ नशेड़ियों को अपराध से पहले ही पकड़े जाने का भय रहता है अतः अपराध काफी कम हो जाते हैं। 
गुजरात में तो घरेलू उपयोग हेतु पक्की शराब की home delivery रही है पर सार्वजनिक उपयोग पर पाबंदी रही है। गुजरात नशाबन्दी के बावजूद भारत का सबसे समृद्ध राज्य है। Revenue loss is a myth only.In 41 countries of europe there is no capital punishment rather solitary confinement for lengthy periods in them is harsher than death penalty, hence very low crime rate. In US crime rate has been high despite capital punishment. Hence capital punishment is never a good deterrent and is ineffective & useless. 
Good quality moderate alcohol has been taken as a better alternative to simple water in cold countries. But in hot countries is should be prohibited to avoid addiction and criminal tendencies. In the cold climate on borders and for fighter soldiers and also for medicinal purposes this should be an exception.