Thursday, 16 July 2020

संभालना वृहद वैश्विक युद्ध को

तृतीय विश्व युद्ध में गोरखपुर

कोविड-19 के दौर में आज जो विश्व परिदृश्य उभरा है, उसमें 1980 के दशक के मध्य से चल रही तीसरे विश्व युद्ध की अटकलें अब वास्तविकता की ओर रुझान कर रही हैं । बीबीसी के पत्रकार हम्फ्री हॉक्सले ने 2003 में प्रकाशित अपने उपन्यास 'द थर्ड वर्ल्ड वॉर' में दिलचस्प विश्लेषण पेश किया है कि कैसे चीन, पाक और उत्तर कोरिया के खतरनाक कृत्यों से इस युद्ध की शुरुआत होती है जिसका परिणाम इन खतरनाक षड्यंत्रकारियों के अंत के साथ होता है। इस उपन्यास में उन्होंने गोरखपुर के एयर बेस की भी महत्वपूर्ण भूमिका का जिक्र किया है। एक अन्य लेखक अनिरुद्ध डी जोशी ने 2006 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'तृतीय विश्व युद्ध' में लेखों की एक श्रृंखला के रूप में इस युद्ध के समय का अनुमान 2026-2031 के निकट लगाया है।

भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री डॉ रवि बत्रा ने संयुक्त राज्य अमेरिका में व्यापार चक्रों व मौद्रिक प्रवृत्तियों के विश्लेषण के आधार पर  अपनी प्रसिद्ध पुस्तकों 'द ग्रेट डिप्रेशन ऑफ 1990' और ' सर्वाइविंग द  ग्रेट डिप्रेशन ऑफ 1990' में इस युद्ध का समय 2029-2036 के दौरान का संकेत दिया है। लेकिन उपन्यासों में सपने या प्रवृत्तियों के विश्लेषण बिलकुल सही सटीक हों, जरूरी नहीं है । 1898 में प्रकाशित मॉर्गन रॉबर्टसन द्वारा प्रकाशित एक लघु उपन्यास 'फ्यूटिलिटी' में कल्पना के रूप में टाइटन नाम के जहाज की तबाही का सपना (और 1912 में टाइटन के मलबे के रूप में संशोधित) असली आरएमएस टाइटैनिक के डूबने के साथ अपनी समानताओं के लिए प्रसिद्ध रहा है, जो 14 साल बाद अप्रैल 2012 में उत्तरी अटलांटिक महासागर में एक ब्रिटिश यात्री लाइनर के रूप में घटित हुआ; इस घटना का उपन्यास के विवरण से कुछ अंतर तो था ही । इस तरह के विवरण इतने महत्वपूर्ण नहीं हैं क्योंकि उनकी सटीकता वास्तविक घटकों के कृत्यों से प्रभावित हो सकती है, लेकिन उनके संकेत महत्वपूर्ण हैं ।

खोएँ नहीं यह महान अवसर

आज पूरी दुनिया में  भलेमानुष लोग और उनकी सरकारें खुद को आतंकवादी और मानव विरोधी ताकतों के खिलाफ अपनी लड़ाई में भारत का सहयोग करने के लिए तैयार बैठी हैं, मुख्य रूप से चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया और यहां तक कि नेपाल की सरकारों के खतरनाक मंसूबों और गतिविधियों के कारण । यह भारत के लिए अच्छा संकेत है। भारत को इस महान अवसर को खोना नहीं चाहिए, ऐसे अवसर  बार-बार नहीं आते। हमें अपनी रक्षा और बाहरी रणनीतियों में वास्तव में आक्रामक होने की जरूरत है। प्रधानमंत्री मोदी ने 4 जुलाई को भगवान कृष्ण को याद करते हुए अपने लेह संबोधन में आह्वान किया है, ' यह विकासवादी का युग है, विस्तारवाद का नहीं ' । ऐसी मुखरता को वास्तविकता में प्रतिबिंबित कर आगे बढ़ जाना चाहिए । हमें व्यापक रणनीतिक उद्देश्यों के साथ अपनी विदेश नीति में बिल्कुल स्पष्ट और मुखर होने की जरूरत है न कि राष्ट्रीय लाभ की संकीर्ण गणना से संतुष्ट रहे।

हमारी विदेश व प्रतिरक्षा नीतियां अत्यधिक रक्षात्मकऔर फिसड्डी रही हैं । हम ताइवान के साथ राजनयिक संबंध शुरू करने की हिम्मत आजतक नहीं जुटा सके, सिर्फ चीन की नाराजगी से बचने के लिए।  लेकिन अब भारत को विश्व समुदाय को अन्तरिम सरकारों के साथ स्वतंत्र देशों के रूप में हॉन्गकॉन्ग, तिब्बत, बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान, दक्षिण मंगोलिया, पूर्वी तुर्किस्तान व मंचूरिया को मान्यता देने के लिए अग्रणी बन स्पष्ट समर्थन और प्रेरणा देनी चाहिए । चीन और उत्तर कोरिया के तानाशाह  शासकों को राष्ट्रीय संप्रभुता की झूठी धारणाओं के साथ उनका केवल आंतरिक मामला मानकर नहीं छोड़ा जा सकता । एक विशाल चीन पूरी दुनिया के लिए हमेशा के खतरा बना रहेगा। विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अधकचरी समझ और इनका विरोध करने वाले सभी संकीर्ण, भाव-प्रवण और वैचारिक कट्टरपंथों पर भी यही बात लागू होती है । विश्व समुदाय को चाहिए कि ऐसी खतरनाक संकीर्ण भावनाओं को बेरहमी से कुचल दें। राष्ट्रवाद और साम्यवाद का उपयोग निरंकुश नेताओं द्वारा सत्ता पर कब्जा करने और बनाए रखने के औजार के रूप में किया गया है ।

इन मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाने और दुनिया के लोगों की समूहिक मानसिकता के साथ चलने से पाक अधिकृत कश्मीर, अक्साई चिन, अरुणांचल प्रदेश, नेपाल और भूटान के मुद्दों को अपने दम पर सुलझाने के लिए अवसर स्वतः ही पैदा होंगे। ऐसे मुद्दों को राष्ट्रवाद के जरिए इतनी आसानी से सुलझाया नहीं जा सकता। राष्ट्रवाद ने हमेशा खूनी युद्धों, त्वरित  विनाश, धीमी लेकिन पीड़ायुक्त गड़बड़ी और साम्राज्यवाद, विस्तारवाद, पराधीनता और शोषण की एक और श्रृंखला को पुनः शुरू करने हेतु आमंत्रण ही साबित हुआ है । वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में राष्ट्रवाद काम नहीं कर सकता । यह राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए प्रभावी नहीं है, बल्कि इसका अधीर, उग्र व उथला दर्शन प्रायः राष्ट्रीय हित का परिणामी विरोधी ही सिद्ध हुआ है ।

सोवियत संघ का विघटनएक भ्रम निवारण       

1987-91 के दौरान सोवियत संघ के विघटन के लिए अक्सर संयुक्त राज्य अमेरिका पर आरोप लगाया जाता रहा है । लेकिन क्या अमेरिका वास्तव में ऐसी ताकतवर महाशक्ति के खिलाफ ऐसे प्रयास में सफल हो सकता है । वास्तविकता यह है: रूसी राष्ट्रवाद और साम्यवाद का मेलजोल ही था जो नियमित रूप से और आंख बंद करके वी आई लेनिन से लेकर आगे के सभी सोवियत तानाशाहों द्वारा स्थानीय आकांक्षाओं, मुद्दों और जरूरतों को दबाने के साथ-साथ राष्ट्रीय हित के नाम पर अधिकतम जानकारी छुपाने के लिए इस्तेमाल किया गया था; और यही वह मेलजोल था जिसके कारण विनिर्माण में निहायत घटिया गुणवत्ता रही और ग्रामीण सोवियतों में उत्पादकता कम हुई—इन सब के कारण सोवियत जनता में काफी हताशा बनी। इस मुद्दे के साथ जुड़ा रूसी तानाशाहों की वोट राजनीति के तहत यूक्रेन, अज़रबैजान, आदि जैसे सोवियत परिसंघ के 16 सदस्य राज्यों को अलग राष्ट्रों के रूप में संयुक्त राष्ट्र परिषद में मतदान करने की अनुमति और नतीजा सोवियत संघ का विघटन । अगर अमेरिका ने भी अपने राज्यों के लिए इसी तरह की नीति अपनाई होती और अपने ५० राज्यों को पृथक राष्ट्रों के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ में मतदान करने की अनुमति दी होती, तो संयुक्त राज्य अमेरिका को भी बहुत पहले ही ऐसे ही विघटन का सामना करना पड़ा होता। इसलिए सोवियत संघ के साथ जो कुछ भी हुआ वह पूरी तरह से उसके अपने तानाशाहों की संकीर्ण व मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण था, और कोई भी ऐसा करने में सक्षम नहीं हो सकता था ।

राष्ट्रवाद और साम्यवाद के इसी तरह के मिश्रण का उपयोग लंबे समय से चीनी तानाशाहों द्वारा किया जाता रहा है और वर्तमान शी जिनपिंग शासन के दौरान फिर से अपने ही लोगों से हरसंभव जानकारी छिपाने और विश्व समुदाय को गुमराह करने की वही प्रवृत्ति है; उसी तरह की खराब गुणवत्ता; पेटेंट और मानव अधिकारों के उल्लंघन; जनता के बीच वैसी ही हताशाऔर पड़ोसी देशों को परेशान करते रहना। इसलिए चीन को अपने तानाशाहों के कृत्यों के कारण किसी भी तरह से टूटना पड़ सकता है । ये सभी कृत्य वर्तमान कोविड की वैश्विक  महामारी में परिणत हो चुके हैं और इस तरह से दुनिया भर की जनता के क्रोध को आमंत्रण मिला है । अमेरिका और उसके सहयोगियों को वैश्विक हितार्थ इस क्रोध को भुनाने का सबसे अच्छा अवसर मिला है ।

पाकिस्तान भी इसी तरह पूरी मानवता के लिए एक खतरे के रूप में उभरा है अपने धार्मिक कट्टरपंथ, इस्लामी आतंकवाद को वहाँ की सरकार और सेना द्वारा खुले समर्थन व संलिप्तता, चीन के साथ अपने मजबूत सहयोग के माध्यम से खतरनाक षड्यंत्र रचने और विश्व समुदाय को गुमराह करने जैसे कृत्यों के द्वारा। यह एक असफल विनाशकारी राज्य है, इसलिए इसे भी अब एक राष्ट्र के रूप में छिन्न-भिन्न होने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए । उत्तर कोरिया को अपने निरंकुश शासन के चंगुल से मुक्त किया जाना चाहिए और बेहतर होगा कि वह दक्षिण कोरिया के साथ विलय के लिए मजबूर हो। ये सब अब वर्तमान में चिढ़े हुए विश्व समुदाय की तत्परता को ध्यान में रखते हुए थोड़े समय में ही पूरा किया जा सकता है । शुरुआती फोकस दो सबसे गैरजिम्मेदाराना सरकारों—चीन और पाकिस्तान को निपटने-निपटाने तक सीमित रहना चाहिए । उनके साथ किसी अन्य सहानुभूतिकर्ता को भी दायरे में लाया जाना चाहिए जब आवश्यक हो । 

राष्ट्रीय संप्रभुतायें और विश्व सरकार

राष्ट्रीय संप्रभुताओं ने हमेशा संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व व्यापार संगठन, सुरक्षा परिषद, डब्ल्यूएचओ और कई अन्य तथाकथित विश्व निकायों की प्रभावकारिता को बाधित किया है ताकि इन वैश्विक संस्थाओं को  शक्तिशाली राष्ट्रों की संप्रभुता की सहूलियत और दया के के अधीन केवल संधिस्वरूप तक सीमित रखा जा सके ।  राष्ट्रीय संप्रभुताओं को विश्व सरकार के साथ-साथ विश्व समुदाय की शांति और कल्याण की उपसेवा में रखने की आवश्यकता है, अन्यथा यह हमेशा विश्व शांति और सुरक्षा के लिए खतरे पैदा करेगा जैसा कि पहले संकेत दिया गया है । इतिहास में यह भी देखा गया है कि कैसे यूरोप के शक्तिशाली राष्ट्र जैसे जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, पुर्तगाल, इटली आदि ने पहले अपने राष्ट्रीय संप्रभुताओं का प्रसार किया, फिर साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया और उसके बाद सैकड़ों वर्षों तक उपनिवेशवाद को बनाए रखा—ये सब अपने राष्ट्रीय हितों को साधिकार अभिवर्धन के नाम पर ।  20वीं सदी में अमेरिका और रूस ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद शीत युद्ध के दिनों में एक-दूसरे के सहयोगियों-समर्थकों व तटस्थों के साथ ऐसा ही किया है । अब अपने सहयोगियों के साथ चीन बेहद गैरजिम्मेदाराना और खतरनाक तरीके से ऐसा ही कर रहा है । यूएनओ जैसे विश्व संगठन अब तक इन निकायों को अप्रभावी बनाने वाले पारस्परिक विरोधाभासी और टकराव वाली राष्ट्रीय संप्रभुताओं का सम्मान करने के लिए बाध्य रहे हैं । इसलिए, भारत को भी अमेरिका और उसके सहयोगियों को विश्व समुदाय की सामूहिक मानसिकता को औपचारिक रूप से वास्तविक प्रतिनिधित्व युक्त, जिम्मेदार और उत्तरदायी विश्व सरकार बनाने के लिए राजी करना चाहिए राष्ट्रीय प्रभुताओं का अतिक्रमण करते हुए।

प्रभावी और स्थायी समाधान

अब फिर से निरंकुश और आतंकवाद की  समर्थक सरकारों के खिलाफ दुनिया भर में लोगों की नाराजगी के मुद्दे पर वापस आते है, इस बार मुख्य रूप से Covid-19 के माध्यम से । उनके गैर-जिम्मेदाराना और खतरनाक कृत्यों का एक प्रभावी और स्थायी समाधान न केवल उनके लिए एक सबक के रूप में बल्कि ऐसे सभी अन्य आत्मकेंद्रित औरस्वयंभू अतिवादी हठधर्मी और शोषक प्रवृत्तियों के लिए एक सीख के रूप में भी आवश्यक है । इस आगामी महान वैश्विक उद्यम के दौरान नुकसान को कम करने हेतु भारतीय और यूरोपीय नेताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे सोवियत संघ  के विघटन में संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका के बारे में रूस की गलतफहमियों को दूर करें और साथ ही अमेरिका को अपने स्वार्थी पूंजीवादी और छद्म पूंजीवादी प्रवृत्तियों को कम करने के लिए राजी करें ताकि पूर्वोल्लिखित तानाशाहों के खतरनाक डिजाइनों के खिलाफ अमेरिका के साथ सहयोग करने में रूस की हिचकिचाहट घट सके और ये दोनों ही दुनिया के कल्याणार्थी लोगों के साथ सहयोग कर सकें। दुनिया भर में आधिपत्य और वर्चस्व के लिए इन दो महाशक्तियों का टकराव शांति, सामूहिक कल्याण और सहयोग की वैश्विक खोज में अच्छे नहीं हैं ।

परमाणु शक्ति होना सरकार या देश के लिए आस्तित्विक गारंटी नहीं  

यदि रूसी सरकार कल्याण और शांति उन्मुख देशों के सभी अनुनय-विनय के बाद भी सहयोग नहीं करती है, तो वह अपनी ही जनता के गुस्से को आमंत्रित करेगी । किसी को भी यह नहीं भूलना चाहिए कि सोवियत संघ  आज से चार गुना अधिक आणविक हथियारों के साथ सबसे बड़ा परमाणु शक्ति था जब वह 1991 में विघटित हुआ। परमाणु शक्ति होना  किसी भी सरकार या देश के लिए कोई आस्तित्विक गारंटी नहीं है—यह एक महान सबक है विशेष रूप से चीन और उसके सहयोगियों के लिए ।  आखिरकार, यह समय अपेक्षाकृत स्थायी विश्व शांति और कल्याण के लिए एक मूल्यवान अवसर है । इस अवसर का दृढ़ता और तेजी से उपयोग किया जाना चाहिए ।

प्रोफेसर आर पी सिंह,

वाणिज्य विभाग,

गोरखपुर विश्वविद्यालय

ब्लॉग: https://rpsinghbhojprant.blogspot.com/

E-mail: rp_singh20@rediffmail.com

                                                   Contact : 9935541965


Sunday, 5 July 2020

Handling the Great Global War


Prof. R.P. Singh,
Department of Commerce,
Gorakhpur University
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
                                                                Contact : 9935541965


In the world scenario that has emerged today in Covid-19 situation, the speculations of third world war going on since mid 1980s are now trending to reality. Alongwith other scholars, BBC journalist Humphrey Hawksley in his novel ‘The Third World War’ first published in 2003 has presented interesting analysis as to how the dangerous acts of China, Pak and North Korea lead to start of this war resulting in end of these dangerous designers. In this novel he has mentioned the significant role of the air base of Gorakhpur too. Another author Aniruddha D. Joshi in his book ‘Third World War’ published in 2006 as a series of articles estimates the timing of this war as near about 2026-2031.

The American economist of Indian origin Dr. Ravi Batra in his analysis of trade cycles in USA also indicates its timing as during 2029-2036 in his famous books ‘The Great Depression of 1990’ and ‘Surviving Great Depression of 1990’. But dreams in novels or analyses of trends need not go with perfect accuracy. The dream of ship wreck as imagined in a novella ‘Futility’ written by Morgan Robertson published in 1898 (and revised as The Wreck of the Titan in 1912) has been famous for its  similarities with sinking of the real RMS Titanic, a British passenger liner in the North Atlantic Ocean 14 years later in April 2012 was bound to have some differences in description. Such descriptions are not so important as their accuracy may be affected by the actual acts of the real players. But their indications are important.

Today the well-meaning people all over the world and their governments are themselves readily willing to support India in their fight against terrorist and anti-human forces mainly due to the dangerous designs and activities of governments of China and also Pakistan, North Korea and even Nepal. It is a good signal for India. India should not waste this great opportunity which will not come time and again. We need to be really aggressive in our defense and external strategies as the Prime Minister Modi has exhorted in his Leh address recalling Lord Krishna on July 4 saying, ‘This is the era of development, not expansionism’. Such assertiveness should reflect & go on in actuality. We need to be quite clear and articulate in our foreign policy with broad strategic objectives and not just narrow calculations of national profit.

Our position so for has been highly defensive. We could not dare to initiate diplomatic relations with Taiwan just to avoid displeasure of China. But now India should support, persuade and champion the world community to recognize Hongkong, Tibbet, Baluchistan, Pakhtunistan, South Mongolia, East Turkestan, Manchuria as independent countries with provisional governments. The tyrannies of China and North Korea cannot be left out merely as internal matters with false notions of national sovereignty. A large China is always danger to the whole world. Same is applicable to all religious as well as narrow sentimental and ideological fanaticism devoid of and opposing science and technology. Such dangerous narrow sentiments need to be crushed by the world community ruthlessly. Nationalism and communism have been used by autocrats as tools of power capturing and perpetuation.

By taking clear position on these issues and going with the people of the world, opportunities will arise on their own for solving the issues of Pak Occupied Kashmir, Aksai Chin, Arunanchal Pradesh, Nepal and Bhutan. Such issues cannot be so easily solved through nationalism. Nationalism has always invited bloody wars, speedy destructions, slow but tormenting disturbances and restart of another series of imperialism, expansionism, subjugation and exploitation. Nationalism can’t work in the present world situation. It is not effective enough to protect the national interests and rather it is inimical to it.

USA has been frequently accused for disintegration of the Soviet Union during 1987-91. But could America really do so against such a mighty superpower. The reality is: It was the amalgam of Russian nationalism and communism which was regularly and blindly used by the Soviet dictators right from V. I. Lenin to suppress the local aspirations, issues and needs as well as hiding maximum information in the name of national interest; and it was this amalgam which led to very poor quality in manufacturing and low productivity in rural soviets—all this led to high frustration among the soviet masses. This issue combined with the vote politics of same Russian dictators to allow members of the Soviet confederation like Ukraine, Ajarbaizan, etc., to vote in the UN assembly as separate nations. Had the Unite States of America also adopted similar policy and allowed its 50 states voting in the UN as separate nations, USA could also have suffered the same fate easily long ago. Hence whatever happened with the USSR was solely due to the narrowisms of its own dictators and none else could be capable to do so.

The similar  amalgam of nationalism and communism has long been used by the Chinese dictators and more so during the present Xi Jinping regime again leading to same phenomena of hiding all information from its own people & also misleading the world community; similar poor quality; patents and human rights violations; same high frustration among the masses;  and disturbing the neighbouring countries. Hence China has to break away anyhow due to acts of its bullet oriented dictators. All this has converged into the current covid pandemic and thus inviting the rage of the world masses. America and its allies have got the best opportunity to encash upon it in global well-being.

Pakistan has also emerged similarly as a danger to थे whole humanity due to its religious fanaticism, open support by its government and military to Islamic terrorism, it’s dangerous designs through strong collaboration with China and misleading the world community. It is a failed destructive state, hence it should also be now forced to disperse as a nation. North Korea should be freed from the clutches of its autocratic regime and better be forced to merge with South Korea. All these can now be done within a short span keeping in mind the readiness of the enraged world community in present. Initial focus should be limited to handling the two most irresponsible ones--China and Pakistan. Any other sympathizing with them should also be within purview when required. 

National sovereighties have always obstructed the efficacy of United Nations, World Trade Organisation, Security Council, WHO and so many other so called world bodies by reducing them to mere treaty status subject to convenience and mercy of sovereignties of the powerful nations.  National sovereignty needs to be put in sub-servience to world governance as well as peace and welfare of the world community, else it will always create dangers to world peace and security as has been indicated earlier. History has also shown as how the powerful nations of Europe like Germany, France, Britain, Spain, Portugal, Italy, etc. first propagated their national sovereighties, then promoted imperialism and thereafter perpetuated colonialism for hundreds of years—all in the name of rightful promotion of their national interests.  The same has been done in the 20th Century by the USA and Russia along with allies of each other during the second world war and thereafter during the cold war days. Now China with its allies is doing the same in extremely irresponsible and dangerous manner. The world organizations like the UNO have been so far bound to honor the mutually contradictory and clashful national sovereignties making these bodies ineffective. Hence, India should also persuade America and its allies to materialize the collective mind of the world community into a formalized really representative, responsible and responsive world government overriding the national sovereignties.

Now let us again come back to the outrage of the people all over the world against the autocracies and terrorism supporting governments this time mainly by way of Covid-19. An effective and lasting solution to their irresponsible and dangerous acts is needed not only as a lesson to them but also as a learning to all such other self-centered and self-imposing extremist dogmatic and exploitative tendencies. To minimize losses during the forthcoming great global venture it is necessary for Indian and also European leaderships to remove the misunderstandings of Russia about the role of the USA in disintegration of USSR as well as persuade the USA to reduce its selfish capitalist and pseudo-capitalist tendencies so that hesitation of Russia in cooperation with America against the dangerous designs of tyrants as mentioned earlier may go wane and both may cooperate with well meaning people of the world. Their clashes for hegemony and supremacy over the world are not good in global search for peace, collective welfare and cooperation.

If Russian government does not cooperate even after all persuasions of welfare & peace oriented countries, it will invite rage of its own people. One should not forget that USSR was the largest nuclear power with four times more arsenals when it got disintegrated in 1991. Being a nuclear power is no existential guarantee for any government or country—this is a great learning particularly for China and its allies.  After all, this time is a worthy opportunity for lasting world peace and welfare. This opportunity should be utilized strongly and speedily.

Sunday, 21 June 2020

Covid-19: People’s White Paper

In the first and second lockdown, it was expected that India would control the pandemic of Covid-19. But as of now, with the first phase of unlocking, the government and the Supreme Court have more or less accepted inherently that the pandemic has become a community spread and now safety of the people is dependent on their own understanding and caution. The challenges before the country, such as security, unemployment, starvation, poverty, etc., outside and within the borders, have forced the governments to believe that this pandemic is not going to be contained due to their efforts, and now everyone has to learn to live with it.

The United States and Europe did not have opportunity to understand and contain the disease until they were caught.  But in India, the Novel Corona was given red carpet welcome by malicious thinking and vested interests. Destiny gave India two months' time, but the blind politics spoiled everything out of the electoral and power games ongoing in some states during February. The first case came to the fore when covid-19 entered this country on 30th January, 2020. On February 3, the number went up to three with return of the group from Wuhan by air. It was a remarkable signal.  The next warning was received on March 4 when 22 people out of those returning from Italy came out positive. But all these warnings were grossly ignored. In the beginning of the second week of February, international flights should have been stopped completely. If there was high pressure to bring the relatives of the leaders and capitalists, they could be allowed to come to India on the condition that till the end of the pandemic, such people would be kept in isolation, not at Jodhpur, but in any uninhabited island of Lakshadweep or Andaman, at the expense of their own or of those who called for their return, in the larger interest of the nation. Had that been done, it was certain that 99 per cent of these patriotic air passengers who escaped thermal scanning by taking fever pills, would have preferred to remain where they were then. At that time, if elections became a hindrance in the process, they also should have been cancelled unflinchingly.

 

Had there been high opposition to this policy by those whose voices remain pitched very high on the support of money and power, the national emergency should have been imposed without hesitation or delay in the larger interest of the country, until this pandemic was over from the world. The idea of immediate imposition of national emergency was raised several times at that time, but the rulers and their incapable and sycophant advisers entangled the whole system severely by their fatalistic, irresponsible and lackluster attitude. Had this been done, there would have been no issue of jamatees, no drama of drunkards, no plight of migrant labour families, no lockdowns; neither the community spread of the pandemic nor the dangers to the lives of corona warriors alongwith the public. India could have prevented the deep recession, avoided this new crisis of poverty and unemployment, and also not faced the series of multisided threats from neighbors on the borders. But the right steps were not taken in time to just avoid the displeasure of a few people. At that time, if the national emergency had been imposed, certainly, the professional opponents would have called it 'strangulation of democracy in the name of Corona'. But the leadership should not bother about such hollow criticisms at all.  

But, at that time, all the attention of the political leaders was in the forthcoming assembly elections in the second week of February. Today's central leadership has developed a tendency to glorify the state level elections more than needed, over and above the interest of the country. Day and night, the overzealous devotees crying every time for nationalism and Bharat Mata completely ignored this impending crisis on the country. Well, as is the intention, so is the implication. As the election results did not come to expectations in five states, with the minds aggrieved, the centre was totally entangled in all this rubbish. When they came out  of this total intoxication of elections and the ensuing hangover of disturbing results in the third month of March, it was too late. Now the curfews and lockdowns were the last ways left.

The situation that has arisen today is a result of poor understanding of global conditions, wrong priorities of politics, poor thinking of pseudo spineless experts and very wrong policies. For example, the Trump administration's proposal on the border dispute that China has generated with India was very hastily rejected, while this was a great opportunity for India to expose China. Suppose India accepts this proposal and China does not accept, the message in the international community will go that China is not willing to have peace and tranquility. The Trump proposal to mediate in Pakistan's case was, of course, totally different and unnecessary.

The role of the media is misleading in many cases. Some press media, social media and many doctors of corona are claiming that the corona has weakened in India and the world's mortality rate is seven percent whereas that is only 2.5 per cent in India. It is a totally wrong assessment. The period of doubling of corona positives in India is still going on for 16 days. In this respect, the correct mortality rate is more or less seven per cent in India as a percentage of corona positive patients 16 days ago. So, it is not proper to take it lightly.

The difficulty of the present leadership and followers is that in political and professional matters, their intellects run in a very fine way with unnecessary complexity. But as soon as it comes to the national interest, their superficial nationalist minds get heated very easily, the omissions of the opposition from Nehru till today are so dominating their minds that their creative rationality is easily disturbed and, at least, in the case of the Novel Corona, they could not rise above the note and vote politics, timely lapses happened and the national interest was really and completely ignored. The compulsions of pseudo-capitalism and crony-capitalism have left no stone unturned to entrap the country in corona. Their tendency of getting irritated and perturbed over every criticism by the opposition and negating even constructive suggestions of theirs has proved to be disastrous for interest of the nation. The people at the top leadership exhort spirituality, yoga, religion, culture and 'Vasudhaiv Kutumbakam' in a very waxed manner, it has also proved to be beneficial in the politics of vote, but there is a great lack of in depth understanding and sincere meditation on these issues, especially the brilliant indications of the supreme consciousness; their understandings and skills of yoga and spirituality are very superficial. So, in this the most important matter of national interest, they failed to take decisions with due wisdom in time. Now it is their compulsion to blame others for covering their mistakes and hurling other things around for diversion.

In economic policies, 'Make in India' is fit for the short run only for the sake of transfer of technology and foreign capital. It is fair weather friend. In the long run, it is only a way to impose capitalism and the opportunism of outside companies on the system. The sustainable path is 'Made in India'. It is also advisable to run 'Make in India' under at least 51 per cent government/public control.

The resurgence of the local economy has now become an immediate obligation. I suggest that give top priority to labour-intensive techniques, projects and activities in the short run. In the long run, capital intensive techniques should be carried out through coordinated cooperatives in medium-sized enterprises and the large enterprises and projects under at least 51% public and government control.

Most of the agricultural holdings have been quite small in size and hence inefficient. They should be pooled into coordinated cooperative farming. Each farmer pooling his land in such cooperative should be guaranteed individual ownership right for return of that land when the venture is closed or restructured. In case he goes out earlier the society may resort to four options depending upon consent of the two parties.

a) The society may continue giving him rent in cash or kind for use of his land.

b) The society may simply return his land if feasible.

c) The society may purchase the land from him by paying adequate compensation in cash or public bonds or both as the resources permit.

d) The state government may allot him equivalent land upto his satisfaction.

 Managerial, attitudinal and conceptual training as well as technical and accounting skill support as per need should be arranged from time to time by the governments and cooperative bodies as an enabling measure. It is far more important than direct financial support as part of turning around the weak and loss prone cooperatives.

Decentralized planning has to be adopted at village and block levels. The central government has announced a plethora of schemes for small businesses and farmers. These can be taken advantage of properly through coordinated cooperatives. Governments should also announce a scheme for promotion of and also for giving priority to coordinated cooperatives and self help groups in support and lending. It is necessary to divert all incentives and subsidies of individual farmers and businesses to coordinated cooperatives and self help groups for the sake of efficiency and promotion of teamworking.

In order to ensure speedy use of local resources in the short run, the states and schemes should be restructured by bringing the local politico-economico-cultural voices and identities into effect at the earliest. Inclusion of these people in the operation of units through coordinated cooperatives in construction; industrial production; production, processing and marketing of agricultural produce, dairying, services etc. is one important way. 


Prof. R.P. Singh,

Department of Commerce,

 Gorakhpur University

E-mail: rp_singh20@rediffmail.com

                                                  Contact : 9935541965


Thursday, 11 June 2020

#कोविड-19: आ करोना सबको मार, हम हैं जनता के सरकार#

पहले और दूसरे लॉकडाउन में पूरी उम्मीद थी कि भारत कोविद-19 की  वैश्विक महामारी पर नियंत्रण कर लेगा। पर अब तो अनलाकिंग के प्रथम चरण के साथ ही सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने भी कमोबेश मान ही लिया है  कि इस महामारी का सामुदायिक फैलाव हो चुका है और अब इससे बचना जनता की समझदारी और सावधानी पर ही निर्भर है। देश को सीमाओं के बाहर और भीतर जैसी चुनौतियां सुरक्षा, बेकारी, भुखमरी, गरीबी आदि की मिलीं हैं इनके चलते सरकारें मानने को बाध्य हुईं कि यह महामारी हमारे रोके नहीं रुकने वाली, अब इसके साथ ही जीना सीखना होगा।
अमेरिका और यूरोप को तो संभलने का मौका बिलकुल नहीं मिला, जबतक इस बीमारी को कुछ समझ पाते तबतक वे इसकी चपेट में आ चुके थे।  पर भारत में तो नावेल कोरोना को दूषित सोच और निहित स्वार्थों के तहत लाया गया। भारत को संभलने के लिए ईश्वर ने दो माह का समय दिया, पर लोकतन्त्र की चुनावी व सत्त्तानशीनी मजबूरियों में अंधी राजनीति ने सब पर पानी फेर दिया। इस देश में 30 जनवरी को  कोविद-19 का प्रवेश हुआ जब पहला मामला सामने आया। तीन फरवरी को संख्या तीन की हो गयी वुहान से हवाई जत्थे के लौटने के साथ ही। यह बहुत बड़ा संकेत था।  अगली चेतावनी चार मार्च को मिली जब इटली से आए 22 लोग पॉज़िटिव निकले। पर इन सभी संकेतों को नज़रअंदाज़ किया गया। फरवरी के दूसरे सप्ताह के आरंभ में ही अंतराष्ट्रीय उड़ानों को बिलकुल बंद कर देना चाहिए था। यदि नेताओं, अधिकारियों, पूँजीपतियों के सगे-संबंधियों को लाने का बहुत दबाव पड़ता तो इस शर्त पर उन्हें भारत पर आने की अनुमति दी जाती कि इस महामारी के दुनिया से समाप्ति तक ऐसे लोगों को राष्ट्र के व्यापक हित में जोधपुर नहीं, बल्कि लक्षद्वीप या अंडमान के किसी निर्जन द्वीप पर, इनके या इन्हें बुलाने वालों के खर्चे पर, आइसोलेशन में रखा जाएगा। यदि ऐसा किया जाता तो इतना तय था कि पैरासिटामाल लेकर थर्मल स्कैनिंग से बच निकलने वाले  99 प्रतिशत राष्ट्रभक्त हवाई यात्री जहां थे वहीं पड़े रहते संकट टलने तक। उस समय चुनाव यदि इस प्रक्रिया में बाधक बनते तो उन्हें भी बेहिचक कैंसिल कर देना था।
भारत में इस देश हितवादी नीति का यदि अधिक विरोध होता, उनके द्वारा जिनकी आवाज़ें पैसे और पावर के बूते बहुत ऊंची रहती हैं, तो बिना संकोच, अविलंब राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर देना चाहिए था, इस महामारी के दुनिया से समाप्ति तक। तत्काल राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने की बात तो उस समय कई बार उठायी गयी थी, पर सत्तासीनों व इनके कचरे सलाहकारों ने अनसुनी कर व्यवस्था को बुरी तरह फंसा दिया। यदि ऐसा किया गया होता तब न जमातियों की नौबत आती, न बेवड़ों का तमाशा, न प्रवासी मजदूर परिवारों का दुर्दशापूर्ण-पलायन, न लॉकडाउन; न महामारी का सामुदायिक प्रसार और न ही आमजन के साथ कोरोना योद्धाओं के जीवन पर संकट आता। भारत गहराती मंदी से भी साफ बच सकता था, गरीबी और बेकारी के इस नए संकट से  बचा जा सकता था और सीमाओं पर चुनौतियाँ देने की हिमाकत पड़ोसी न कर पाते। पर चंद लोगों की नाराजगी से बचने के लिए समय पर सही कदम नहीं उठाया गया। उस समय यदि राष्ट्रीय आपातकाल लागू करते तो निश्चित ही पेशेवर विरोधी इसे कोरोना के नाम पर लोकतन्त्र का गला घोटने की संज्ञा देते। पर नेतृत्व को ऐसी खोखली आलोचनाओं की परवाह बिलकुल नहीं करनी चाहिए।  

27 जनवरी को नेपाल में नॉवेल कोरोना प्रवेश के एक खबर के भारत में प्रकाशित होने के साथ ही सभी बच्चों-बूढ़ों में इसे रोकने की जागरूकता आ चुकी थी। फरवरी के दूसरे सप्ताह में स्नातक के एक क्लास में पढ़ते वक्त दो छात्र आपस में अचानक कोरोना पर बात करने लगे। इसपर मैंने उन्हें यह कहते हुए टोका कि कोरोना तो दुनिया भर की समस्या है, लेकिन यहाँ दूसरा टॉपिक चल रहा है इसकी ओर ध्यान दें। इसपर एक छात्र ने कहा, सर, अब तो यह देश में भी आ गया है,  जिंदा रहेंगे तभी तो पढ़ेंगे।     
पर, उस समय नेता लोगों का सारा ध्यान तो फरवरी के दूसरे सप्ताह में आसन्न विधानसभा चुनावों में लगा हुआ था। आज का केंद्रीय नेतृत्व राज्यस्तरीय चुनावों को देशहित से ऊपर रखकर इन्हें जरूरत से ज्यादा महिमामंडित करने तथा इनमें सर खपाने की प्रवृत्ति पाले बैठा है। दिन-रात उठते-बैठते राष्ट्रवाद और भारत माता की रट लगाने वाले अतिउत्साही भक्त इस देश पर आसन्न सबसे बड़े संकट को ऐन मौके पर पूरी तरह छिपी मजबूरियों के तहत नज़रअंदाज़ कर गए। खैर, जैसी नीयत वैसी बरकत, जैसी भावना वैसी सिद्धि। पाँच राज्यों  में चुनाव परिणाम मन-माफिक नहीं आए, मन खिन्न हुआ, केंद्र ऐसा उलझा कि मार्च के तीसरे माह में जाकर कहीं चुनाव और परिणाम का खुमार उतरा, पर काफी देर कर चुके थे, अब तो कर्फ़्यू और लॉकडाउन ही आखिरी रास्ता बचा था।
अब जो चूक हो चुकी उसको विचार में लाने से कोई लाभ है क्या? हाँ, बहुत आवश्यक है, असलियत को समझने के लिए, आगे के लिए बहुत से सबक निहित हैं इसमें। आज जो स्थिति उत्पन्न हुई है वह वैश्विक स्थितियों की घटिया समझ,राजनीति की गलत प्राथमिकताएं, बन्तु चाटुकार विशेषज्ञों की निकृष्ट सोच व निहायत गलत नीतियों का नतीजा है। उदाहरण के लिए, चीन द्वारा भारत के साथ उत्पन्न किए गए सीमा-विवाद पर ट्रम्प प्रशासन के प्रस्ताव को बहुत जल्दबाज़ी में साफ मना कर दिया गया। जबकि भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर था चीन की कलई खोलने का। मान लीजिये भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता और चीन नहीं स्वीकारता तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में संदेश जाता कि चीन  सुलह-शांति का इच्छुक है ही नहीं। पाकिस्तान के मामले में मध्यस्थता का ट्रम्प प्रस्ताव इससे बिलकुल भिन्न व अनावश्यक था।
मीडिया की भूमिका कई मामलों में गुमराह करने वाली है। कोरोना पर कुछ प्रेस मीडिया, सोशल मीडिया व अनेक चिकित्सक दावा कर रहे हैं कि भारत में आते-आते कोरोना कमजोर पड़ चुका है और दुनिया में कोविद 19 से मृत्यु दर सात प्रतिशत की अपेक्षा भारत में महज 2.5 प्रतिशत ही है। यह पूरी तरह गलत आकलन है। भारत में कोरोना पॉज़िटिव की दूनी होने की अवधि अभी 16 दिन चल रही है। इस लिहाज से सही मृत्यु दर 16 दिन पहले के कोरोना पॉज़िटिव मरीजों के प्रतिशत के रूप में भारत में भी कमोबेश सात प्रतिशत ही ठहरती है। अतः इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है।
वर्तमान नेतृत्व और भक्तों की कठिनाई यह है कि राजनीतिक व व्यवसायिक  मामलों में तो इनकी बुद्धि अनावश्यक जटिलता के साथ बहुत महीन तरीके से चलती है। पर राष्ट्रहित की बात सामने आते ही इनका सतही राष्ट्रवादी दिमाग अचानक गरम हो उठता है, नेहरू से लेकर आजतक के विपक्ष की चूकें इनकी स्मृति पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि इनका रचनात्मक विवेक   बिगड़ जाता है और कम से कम नॉवेल कोरोना के मामले में तो समय पर चूक ही गए, नोट और वोट की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाये, राष्ट्रहित की वास्तव में पूरी तरह अनदेखी कर गए। छद्म पूंजीवाद व पिट्ठू पूंजीवाद की मजबूरियों ने देश को फँसाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। विपक्ष की हर आलोचना पर बिदकने और उलझने की अपरिपक्क्वता देशहित साधन में घातक साबित हुई है। शीर्ष नेतृत्व के लोग अध्यात्म, योग, धर्म, संस्कृति और वसुधैव कुटुंबकम की बातें तो खूब करते है, वोट के राजनीति-व्यापार में यह लाभकारी भी साबित हुआ है, पर इस शीर्ष नेतृत्व में इन बातों पर, खासकर परमतत्व  के गहन-गंभीर ध्यान-साधन का घोर अभाव है, उन्हें योग व अध्यात्म के सही कौशल की आवश्यकता है ताकि वे सही समय पर सम्यक बुद्धि से निर्णय ले सकें।
आर्थिक नीतियों में ‘मेक इन इंडिया’ तकनीकी हस्तान्तरण हेतु अल्पसमय के लिए ही उपयोग के लायक है। दीर्घकाल में तो यह पूंजीवाद को व्यवस्था पर थोपने व ‘सुख के साथी’ बाहरी कंपनियों के  अवसरवाद का ही उपाय है। अतः टिकाऊ रास्ता तो  ‘मेड इन इंडिया’ ही है। स्थानीय अर्थव्यवस्था को उबारना अब तात्कालिक बाध्यता बन चुकी है। मेरा सुझाव है कि तात्कालिक तौर पर श्रम-गहन तकनीकों, परियोजनाओं व गतिविधियों को प्राथमिकता दें। दीर्घकाल में पूंजी गहन  तकनीकों का मध्यम आकार के उद्यमों में समन्वित सहकारिता के माध्यम से तथा बड़े उद्यमों व परियोजनाओं को सार्वजनिक व सरकारी नियंत्रण में चलाया जाना चाहिए। स्थानीय साधनों का अल्पकाल में ही तेजी से उपयोग सुनिश्चित हो सके, इसके लिए राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक स्थानीय आवाज़ व पहिचान को तत्काल कार्यरूप में लाते हुए प्रदेशों व योजनाओं का पुनर्गठन किया जाना चाहिए। ‘मेक इन इंडिया’ को कम से कम 51 प्रतिशत के सरकारी/सार्वजनिक नियंत्रण में चलाया जाना ही उचित है।

Wednesday, 10 June 2020

कोविड-19: आमजन का श्वेतपत्र:करे कोई, भरे-मरे जनता



पहले और दूसरे लॉकडाउन में पूरी उम्मीद थी कि भारत कोविद-19 की  वैश्विक महामारी पर नियंत्रण कर लेगा। पर अब तो अनलाकिंग के प्रथम चरण के साथ ही सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने भी कमोबेस मान ही लिया है  कि इस महामारी का सामुदायिक फैलाव हो चुका है और अब इससे बचना जनता की समझदारी और सावधानी पर ही निर्भर है। देश को सीमाओं के बाहर और भीतर जैसी चुनौतियां सुरक्षा, बेकारी, भुखमरी, गरीबी आदि की मिलीं हैं इनके चलते सरकारें मानने को बाध्य हुईं कि यह महामारी हमारे रोके नहीं रुकने वाली, अब इसके साथ ही जीना सीखना होगा।
अमेरिका और यूरोप को तो संभलने का मौका बिलकुल नहीं मिला, जबतक इस बीमारी को कुछ समझ पाते तबतक वे इसकी चपेट में आ चुके थे।  पर भारत में तो नावेल कोरोना को दूषित सोच और निहित स्वार्थों के तहत लाया गया। भारत को संभलने के लिए नियति ने दो माह का समय दिया, पर लोकतन्त्र की चुनावी व सत्त्तानशीनी मजबूरियों में अंधी राजनीति ने सब पर पानी फेर दिया। इस देश में 30 जनवरी को  कोविद-19 का प्रवेश हुआ जब पहला मामला सामने आया। तीन फरवरी को संख्या तीन की हो गयी वुहान से हवाई जत्थे के लौटने के साथ ही। यह बहुत बड़ा संकेत था।  अगली चेतावनी चार मार्च को मिली जब इटली से आए 22 लोग पॉज़िटिव निकले। पर इन सभी संकेतों को नज़रअंदाज़ किया गया। फरवरी के दूसरे सप्ताह के आरंभ में ही अंतराष्ट्रीय उड़ानों को बिलकुल बंद कर देना चाहिए था। यदि नेताओं, पूँजीपतियों के सगे-संबंधियों को लाने का बहुत दबाव पड़ता तो इस शर्त पर उन्हें भारत पर आने की अनुमति दी जाती कि इस महामारी के दुनिया से समाप्ति तक ऐसे लोगों को राष्ट्र के व्यापक हित में जोधपुर नहीं, बल्कि लक्षद्वीप या अंडमान के किसी निर्जन द्वीप पर, इनके या इन्हें बुलाने वालों के खर्चे पर, आइसोलेशन में रखा जाएगा। यदि ऐसा किया जाता तो इतना तय था कि पैरासिटामाल लेकर थर्मल स्कैनिंग से बच निकलने वाले  99 प्रतिशत राष्ट्रभक्त हवाई यात्री जहां थे वहीं पड़े रहते संकट टलने तक। उस समय चुनाव यदि इस प्रक्रिया में बाधक बनते तो उन्हें भी बेहिचक कैंसिल कर देना था।
भारत में इस देश हितवादी नीति का यदि अधिक विरोध होता, उनके द्वारा जिनकी आवाज़ें पैसे और पावर के बूते बहुत ऊंची रहती हैं, तो बिना संकोच, अविलंब राष्ट्रीय आपातकाल लागू कर देना चाहिए था, इस महामारी के दुनिया से समाप्ति तक। तत्काल राष्ट्रीय आपातकाल लागू करने की बात तो उस समय कई बार उठायी गयी थी, पर सत्तासीनों व इनके कचरे सलाहकारों ने अनसुनी कर व्यवस्था को बुरी तरह फंसा दिया। यदि ऐसा किया गया होता तब न जमातियों की नौबत आती, न बेवड़ों का तमाशा, न प्रवासी मजदूर परिवारों का दुर्दशापूर्ण-पलायन, न लॉकडाउन; न महामारी का सामुदायिक प्रसार और न ही आमजन के साथ कोरोना योद्धाओं के जीवन पर संकट आता। भारत गहराती मंदी से भी साफ बच सकता था, गरीबी और बेकारी के इस नए संकट से  बचा जा सकता था और सीमाओं पर चुनौतियाँ देने की हिमाकत पड़ोसी न कर पाते। पर चंद लोगों की नाराजगी से बचने के लिए समय पर सही कदम नहीं उठाया गया। उस समय यदि राष्ट्रीय आपातकाल लागू करते तो निश्चित ही पेशेवर विरोधी इसे कोरोना के नाम पर लोकतन्त्र का गला घोटने की संज्ञा देते। पर नेतृत्व को ऐसी खोखली आलोचनाओं की परवाह बिलकुल नहीं करनी चाहिए।   
पर, उस समय नेता लोगों का सारा ध्यान तो फरवरी के दूसरे सप्ताह में आसन्न विधानसभा चुनावों में लगा हुआ था। आज का केंद्रीय नेतृत्व राज्यस्तरीय चुनावों को देशहित से ऊपर रखकर इन्हें जरूरत से ज्यादा महिमामंडित करने तथा इनमें सर खपाने की प्रवृत्ति पाले बैठा है। दिन-रात उठते-बैठते राष्ट्रवाद और भारत माता की रट लगाने वाले अतिउत्साही भक्त भारत माता पर आसन्न संकट को ऐन मौके पर पूरी तरह भूल गए। खैर, जैसी नीयत वैसी बरकत, जैसी भावना वैसी सिद्धि। पाँच राज्यों  में चुनाव परिणाम मन-माफिक नहीं आए, मन खिन्न हुआ, केंद्र ऐसा उलझा कि मार्च के तीसरे माह में जाकर कहीं चुनाव और परिणाम का खुमार नशा उतरा, पर काफी देर कर चुके थे, अब तो कर्फ़्यू और लॉकडाउन आखिरी रास्ता बचा था।
अब जो चूक हो चुकी उसको विचार में लाने से कोई लाभ है क्या? हाँ, बहुत आवश्यक है, असलियत को समझने के लिए, आगे के लिए बहुत से सबक निहित हैं इसमें। आज जो स्थिति उत्पन्न हुई है वह वैश्विक स्थितियों की घटिया समझ,राजनीति की गलत प्राथमिकताएं, बन्तु चाटुकार विशेषज्ञों की निकृष्ट सोच व निहायत गलत नीतियों का नतीजा है। उदाहरण के लिए, चीन द्वारा भारत के साथ उत्पन्न किए गए सीमा-विवाद पर ट्रम्प प्रशासन के प्रस्ताव को बहुत जल्दबाज़ी में साफ मना कर दिया गया। जबकि भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर था चीन की कलई खोलने का। मान लीजिये भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता और चीन नहीं स्वीकारता तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में संदेश जाता कि चीन  सुलह-शांति का इच्छुक है ही नहीं। पाकिस्तान के मामले में मध्यस्थता का ट्रम्प प्रस्ताव इससे बिलकुल भिन्न व अनावश्यक था।
मीडिया की भूमिका कई मामलों में गुमराह करने वाली है। कोरोना पर कुछ प्रेस मीडिया, सोशल मीडिया व अनेक चिकित्सक दावा कर रहे हैं कि भारत में आते-आते कोरोना कमजोर पड़ चुका है और दुनिया में कोविद 19 से मृत्यु दर सात प्रतिशत की अपेक्षा भारत में महज 2.5 प्रतिशत ही है। यह पूरी तरह गलत आकलन है। भारत में कोरोना पॉज़िटिव की दूनी होने की अवधि अभी 16 दिन चल रही है। इस लिहाज से सही मृत्यु दर 16 दिन पहले के कोरोना पॉज़िटिव मरीजों के प्रतिशत के रूप में भारत में भी कमोबेश सात प्रतिशत ही ठहरती है। अतः इसे हल्के में लेना ठीक नहीं है।
वर्तमान नेतृत्व और भक्तों की कठिनाई यह है कि राजनीतिक व व्यवसायिक  मामलों में तो इनकी बुद्धि अनावश्यक जटिलता के साथ बहुत महीन तरीके से चलती है। पर राष्ट्रहित की बात सामने आते ही इनका सतही राष्ट्रवादी दिमाग अचानक गरम हो उठता है, नेहरू से लेकर आजतक के विपक्ष की चूकें इनकी स्मृति पर इस कदर हावी हो जाती हैं कि इनका रचनात्मक पहलू  बिगड़ जाता है और कम से कम नॉवेल कोरोना के मामले में समय पर चूक गए, नोट और वोट की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाये, राष्ट्रहित की वास्तव में पूरी तरह अनदेखी कर गए। छद्म पूंजीवाद व पिट्ठू पूंजीवाद की मजबूरियों ने देश को फँसाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है। विपक्ष की हर आलोचना पर बिदकने और उलझने की अपरिपक्क्वता देशहित साधन में घातक साबित हुई है। शीर्ष नेतृत्व के लोग अध्यात्म, योग, धर्म, संस्कृति और वसुधैव कुटुंबकम की बातें तो खूब लच्छेदार तरीके से करते हैं, वोट के राजनीति-व्यापार में यह लाभकारी भी साबित हुआ है, पर नेतृत्व में इन बातों पर, खासकर परमतत्व  के गहन-गंभीर ध्यान-साधन का घोर अभाव है, उनकी योग व अध्यात्म की समझ व कौशल एकदम सतही है। अत: वे राष्ट्रहित के ऐसे सबसे  महत्मेंवपूर्ण मामले में समय पर  सम्यक बुद्धि से निर्णय लेने में चूक गए। अब अपनी गलतियों को कवर देने के लिए दूसरों को दोषी बनाना और इधर-उधर की बातें उछालना मजबूरी ही तो है।
आर्थिक नीतियों में मेक इन इंडिया तकनीकी हस्तान्तरण हेतु अल्पसमय के लिए ही उपयोग के लायक है। दीर्घकाल में तो यह पूंजीवाद को व्यवस्था पर थोपने व सुख के साथी बाहरी कंपनियों के  अवसरवाद का ही उपाय है। अतः टिकाऊ रास्ता तो  मेड इन इंडिया ही है।   
प्रोफेसर आर पी सिंह,
वाणिज्य विभाग,
गोरखपुर विश्वविद्यालय
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
                                                      Contact : 9935541965