Monday, 28 December 2020

जातीय विवाह प्रथा है जबतक, जातिवाद व आरक्षण है तबतक

सीरिया से दीन-हीन शरणार्थी बनके वहाँ के मुसलमान  सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे  बगल के बीसियों इस्लामी देशों में जाने के बजाय कई गुना दूर न्यूजीलैंड (नौ गुना दूर), यूरोप के अनेक देशों यथा जर्मनी, इटली आदि पहुँच गए। 56 इस्लामी देशों की छिपी सहमति। अपने यहाँ शरण दे सकते थे। पर इन्हें तो पूरी दुनिया में इस्लाम को स्थापित करना है—पहले दीन-हीन शरणार्थी के तौर पर घुसो और फिर आगे अपना वैश्विक संकल्प कार्यक्रम।

अब सोचिए। दुनियाभर में इस्लाम को फैलाने का मुसलमानों का संकल्प इतना प्रबल है कि वे घर-परिवार, नाते-बिरादरी, संपत्ति-देश का मोह छोड़ कहीं भी पैगाम ले जाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। जातीय वर्चस्व, रूढ़ियों-रिवाजों, संयुक्त परिवार, बहु देवी-देवताओं के मोह में पड़े मूर्तिपूजक हिन्दू मानसिकता में इतनी बुद्धि आ सकती है क्या! हिन्दू तो मानकर चलता रहा है कि उसका देश दुनिया में सबसे सुखकर, सबसे अच्छा, सबसे पवित्र है, देवभूमि है। इसे छोड़कर कहीं नहीं जाना। इसी प्रवृत्ति के चलते  हिंदुओं का देश केवल भारत ही बचा है किसी तरह। वह भी कौन सा भारत? अशोक के उपरांत टूटते-बिखरते 40% बचा भारत। वसुधईव कुटुम्बकम तो हमेशा उपेक्षित रहा। राष्ट्रमोह और राष्ट्रवाद जो ऊपरी तौर पर बड़ा आकर्षक लगता है, वास्तव में हिंदुत्व की आत्महत्या का संकल्प है ।

त्याग हिन्दू भी करना जानते हैं, पर यहाँ त्याग सन्यासियों का पेशा बना दिया गया। गृहियों का काम तो दायित्वों के बहाने संकीर्णताओं का संरक्षण का रहा है। यही दशा रही तो लाख दावों-पैरोकारों के बावजूद हिन्दुत्व तीस साल से ज्यादा बच ही नहीं सकता। 

हिन्दुत्व ईसाई और इस्लाम से पहले से ही अस्तित्व में है। पर आधी दुनिया ईसाई और 56 देश मुस्लिम हो गए, जबकि हिन्दू भारत में ही सिमट कर रह गया। कहीं तो गड़बड़ी है कि हम गुप्तकाल के पराभव के समय से ही ‘वसुधईव कुटुंबकम’ और ‘स्वदेशों भुवनत्रयो’ की उपेक्षा कर राष्ट्रवादी संकीर्णताओं में उलझकर रह गए। आज भी वही महान ऐतिहासिक गलतियाँ हम दुहराएँ जा रहे हैं। आज दुनिया इसाइयत और इस्लाम की गलाकाट प्रतिद्वंद्विता में पिस रही है। भारत भी इस विनाश से अछूता नहीं रह सकता। पर शीघ्र ही सब दुरुस्त होगा, हम आशावादी हैं।

यदि हिन्दुत्व को बचना है तो जातीय पहिचान की बैशाखी के बिना चलना सीखना होगा, जाति भेद समाप्त करना होगा। लेबल का मोह छोड़ मानव धर्म का परचम लहराना होगा। वही मानव धर्म जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भागवत धर्म कहा था। उस समय आज की तरह मानवता हिन्दू, ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन, सिक्ख आदि में बंटी नहीं थी। अतः सम्पूर्ण मानव जाति को भगवत्ता की ओर उन्नयन का आह्वान हुआ था। वही भागवत धर्म आज की बंटी मानवता के लिए  मानव धर्म है। धर्मों और मत-मतांतरों का इस लिहाज से समभाव के साथ स्वीकारा जाता रहा है कि इससे विविधता और बहुरसता आति है। पर यह देखा गया है कि इन्होंने विविधता और बहुरसता से कहीं ज्यादा मारकाट और रक्तपात मचाया है पूरी दुनिया में नस्ल और जातिवाद के साथ मिलकर सदियों से।

क्या हुआ यदि आर्य भारत के बाहर से आए, कालांतर में मुसलमान और ईसाई भी! जितना अधिक सांस्कृतिक विमिश्रण हो उतना ही अनुभव और विविधता बढ़ती है। अच्छी बात नहीं है यदि कोई दावा करे कि सभ्यता के आदिकाल से, हजारों-लाखों वर्षों से हम एक ही स्थान के निवासी बने रहे हैं, कूप मंडूक रहे हैं। बात केवल सांस्कृतिक विमिश्रण और अनुभव-ज्ञान वृद्धि की ओर उन्मुख हो तो कोई समस्या नहीं। पर इन धर्ममतों के मूल में ही कुछ ऐसी समस्या रही है कि ये विभिन्न धर्ममत अपनी श्रेष्ठता और पूर्णता के अहंकार में चूर हो अपने अलावा दूसरे किसी के अस्तित्व को अन्तर्मन से स्वीकार नहीं कर पाते और कठमुल्लों की मेहरबानी से सभ्यताओं में टकराव और मारकाट बढ़ता रहा है। 

अतः विविधता और बहुरसता बनाए रखने हेतु प्राकृतिक व भूसांस्कृतिक भिन्नताओं को महत्व, मान्यता व पहिचान देना उचित है  जातियों, नस्लभेदों और मत-मतांतरों के स्थान पर; जबकि मजहबी पहिचान को  भूसांस्कृतिक विविधताओं में मिलाकर इनका अस्तित्व ही खत्म करने कीआवश्यकता है। प्राउट का समाज आंदोलन इन्हीं प्राकृतिक व भूसांस्कृतिक भिन्नताओं को महत्व, मान्यता व पहिचान देने पर केन्द्रित है, पहिचान के कृत्रिम व बलात आरोपण के बजाय।

हिन्दुत्व की सबसे बड़ी कमजोरी जाति व्यवस्था है जिसके दुष्प्रभाव जातिवाद, जातिभेद और जातीय-संघर्ष हैं। आरक्षण जाति व्यवस्था के दुष्प्रभावों से क्षतिपूर्ति का उपाय है।  जैसे अनेक विचारक मानते हैं जाति होनी चाहिए पर जातीय-संघर्ष नहीं बल्कि जातीय समरसता बने। दीनदयाल उपाध्याय जी लिखते  हैं:

अपने यहाँ भी जातियां बनीं किन्तु एक जाति व दूसरी जाति में संघर्ष है, जनका यह भूलभूत विचार हमने नहीं माना। हमारे वर्णों की कल्पना भी विरापुरुष के चारों अंगों से की है ।” (एकात्म मानववाद, पृ0 49)

ऐसे विचारक जाति को हिन्दुत्व के अस्तित्व और पहचान का आवश्यक तत्व समझते हैं। वर्ण-व्यस्था को भी निहित स्वार्थी जाति को बरकरार रखने का परोक्ष साधन बना लेते हैं। ऐसे लोग जाति-व्यस्था का उन्मूलन अनावश्यक व असंभव मानते हैं।

सवर्णवादी आरक्षण को हटाने की बात करते हैं जबकि आरक्षण के समर्थक पहले जाति तब आरक्षण हटेगा का आह्वान करते हैं। जाति व्यवस्था भारत की  सदियों की गुलामी और कमजोरी का कारण रही है  पर आज के विज्ञान और टेक्नालजी  के  युग में जाति-व्यवस्था का उन्मूलन कठिन नहीं है। संकल्प और युक्ति अपनानी होगी।

जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश  हाई कोर्ट  के वकील तथा  बघेली समाज से जुड़े उदय कुमार साहू इसका स्पष्ट, साहसिक, कारगर व रोचक सुझाव देते हैं,

“जातीय विवाह प्रथा है जबतक ,

जातिवाद व आरक्षण है तबतक ।

अन्तर सम्प्रदायिक विवाह की करो शुरुआत ।

संप्रदायवाद से देश पायेगा निजात ।

जातीय विवाह प्रथा संविधान के लक्ष्य को खासकर मूल अधिकार, समाजवाद, आर्थिक आजादी, स्वतंत्रता तथा राष्ट्रीय एकता के लक्ष्य को प्राप्त करने में बाधक है इसलिये भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत जातीय विवाह प्रथा शून्य है ।

 इस प्रथा को शून्य कराए जाने के लिये न्यायालय के शरण में जाने की जरुरत नहीं है ।

 सभी जातीय या सम्प्रदायिक विवाद का मूल कारण जातीय विवाह प्रथा है जो संविधान विरोधी होने के वावजूद भी सरकारों के द्वारा दन्ड्नीय अपराध नहीं बनाया गया है ।

 राष्ट्र के कल्याण के लिये सरकार को भारतीय दंड संहिता में एक नई धारा 494A जोड़ा जाना चाहिए जिसके तहत जातीय विवाह करने वालों को 10 वर्ष का जेल और 50,000 / रुपए जुर्माने का प्रावधान हो ।

 जातीय विवाह करने वालो को सरकारी नौकरी से वंचित करने का प्रावधान सेवा कानून में किया जाना चाहिए ।

 जातीय परिभाषा में सामान्य, ओबीसी, एससी, एसटी, मुस्लिम ,इसाई,बौध ,पारसी आदि को अलग-अलग जाति माना जाना चाहिए ताकि ओबीसी का विवाह ओबीसी में ना होकर किसी अन्य में हो, उसी प्रकार मुस्लिम का विवाह मुस्लिम में ना हो सके इत्यादि।”

मैं समझता हूँ कि इस देश ही नहीं दुनिया में सभ्यताओं के टकराव के समाधान की दिशा में साहू जी के पूर्वोक्त सुझाव सटीक औषधि साबित होंगे। अतः इन्हें हर कीमत पर लागू करना होगा।    

इन सटीक व उत्तम सुझावों को लागू कर बहुत कम समय, 4 या 5 सालों में ही भारत के जाति और संप्रदाय के ताने-बाने की को पूरी तरह से ध्वस्त कर सकते हैं। पर इसमें विचारधारा व परिस्थितियों के अनुरूप कुछ जोड़-घटाना पड़ेगा। जैसे: भारत के भीतर दो विदेशियों के बीच शादी के मामले में यह नियम लागू नहीं होगा लेकिन अगर कोई भी पार्टनर भारतीय मूल का विदेशी नागरिक है तो यह लागू रहेगा।

इस तरह के दण्डात्मक उपायों का कुछ लोग इस आधार पर विरोध करते हैं कि ऐसे मामलों में धनात्मक उपाय अपनाएं। पर लम्बे समय से समाज सुधारकों ने सकारात्मक ढंग से भारतीय समाज को जाति और सम्प्रदाय वादों से बाहर निकालने का प्रयास किया पर विफल रहे और स्थितियां और भी जटिल हुई हैं। अतः लाख विरोधों के बावजूद निषेधात्मक व दन्डकारी उपायों का कम से कम बीस वर्षों तक दृढ़ता से उपयोग ही सटीक परिणाम मिलेगा।

कुछ लोग नाम से टाइटल हटाते रहे हैं तो भी जाति-व्यवस्था यथावत है। वास्तव में यह पूर्वोक्त कानूनी उपाय के बाद ही प्रभावी हो सकता है। अगले चरण में जाति बोधक टाइटल्स को हटाने आगे के उपयोग को भी कानूनन प्रतिबंधित करना आवश्यक होगा।

टाईटिल हटाना समाधान है क्या?

टाईटिल हटाना समाधान होता तो प्राउट दर्शन प्रणेता श्री प्रभात रंजन सरकार ऐसा कर सकते थे। सुभाष चंद्र बोस, ज्योतिबा फूले, डा भीमराव अंबेडकर, अरविंद घोष, मोहनदास करम चंद गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सरदार पटेल आदि अनेकों चर्चित नाम हैं जो बड़ी आसानी से टाईटिल हटाकर समाधान दे दिये होते। फिर महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, छ्त्रसाल, राजा सुहेलदेव के नाम के आगे टाईटिल तो नहीं है, पर क्या इनकी जातीय पहिचान खत्म हो गयी? टाईटिल हटाने से कुछ नाम भले ही (सभी नहीं) सूने या अधूरे लगें पर पूर्वकथित कठोर उपायों को लागू किए सिर्फ बिना टाईटिल हटा देने से काम नहीं चलेगा।  सारे टाईटिल्स के उपयोग को पहले संवैधानिक/कानूनी तौर पर अंतरजातीय अंतर्राष्ट्रीय बनाया जाय तथा बाद में जातिबोधक टाईटिल्स को कानूनन प्रतिबंधित किया जा सकता है। हाँ, जाति संप्रदाय बोधक संगठनों को पहले ही प्रतिबंधित करना होगा भले ही वे जाति या समुदाय के सुधार पर बनी हों, ताकि वोट की जाति-संप्रदाय वाली राजनीति पर सीधे चोट की जा सके।

प्रोफेसर आर पी सिंह,
वाणिज्य विभाग,
गोरखपुर विश्वविद्यालय
E-mail: rp_singh20@rediffmail.com
                                                               Contact : 9935541965


Wednesday, 28 October 2020

BECA समझौते से आगे व्यवस्था भी तो रास्ता पकड़े

BECA समझौते के साथ ही भारत-अमेरिका के सैन्य-सूचना के तकनीकी सहयोग का चौथा चरण पूरा हो गया। पर समाज व राष्ट्र निर्माण का कार्य अधूरा है और सही ट्रैक पर लाया जाना बाकी है।

 सारे जहां से अच्छा हिंदोस्ता हमारा, हमारी जन्मभूमि स्वर्ग से भी अधिक अच्छी है, ऐसी धारणा सच हो तो भी ऐसी आत्ममुग्धता, ऐसा गर्व, ऐसा अहंकार प्रगति के मार्ग में बाधक बन आत्मघाती ही साबित हुई है। ऐसी धारणाएं सतही तौर पर बहुत अच्छी, राष्ट्र भक्ति से ओत-प्रोत लगती हैं। पर वास्तव में यह विकासपरक और स्पर्धात्मक नहीं बल्कि भाग्यवादी, भोगवादी व अवनतिकारी रही है। यह दृष्टिकोण ही  अवसरवादी धारणा है जो अकर्मण्यता, शिथिलता व  कूप-मण्डूकता को प्रोत्साहित करती रही है। यही मनोवृत्ति भारतीय उपमहाद्वीप की सदियों की गुलामी और आज की अकुशलता, टकराव व भ्रष्ट मनोवृत्ति के लिए जिम्मेदार है। फिर  क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विकास पर कितने भी सेमिनार-सम्मेलन कर लीजिए, तकनीकी प्रयास कर लीजिए, सब सब ढाक के वही तीन पात। 

हिटलर ने भी ऐसी ही अहंकारी आर्यवादी धारणा का पोषण कर विनाश को आमंत्रित किया था। पर द्वतीय विश्व युद्ध में काफी विनाश के बाद जर्मनी ने अपनी धारणा बदली। ऐसी अहंकारी  धारणा चीन ही नहीं, रूस और अमेरिका जैसों की उन्नति को मटियामेट करने की क्षमता रखती है। 

 *सही दृष्टिकोण* है: _हम जिस जैवक्षेत्र में, जिस देश में,जिस समाज में रह रहे हैं, जीविकोपार्जन कर रहे हैं उसे दुनिया में सबसे अच्छा बनाना है, उस औरों से बेहतर बनाने के हर प्रयास करते जाना है।_ यही नजरिया है जिसने अमेरिका, जापान, इजरायल, डेनमार्क, इटली, हालैण्ड समेत कभी मध्यकाल में बात-बात पर लड़ने वाले  समूचे यूरोप में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का निर्माण कर इन्हें समृद्धि और खुशहाली के शिखर पर पहुंचाया।

प्रोफेसर आर पी सिंह

दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय


Sunday, 27 September 2020

निजीकरण नहीं, आर्थिक पुनर्रचना ही उचित मार्ग

 

निजीकरण एक फैशन बन गया है। खुले या पिछले दरवाजे से। निजीकरण की कुछ सबसे बड़ी चालें जो पहले ही चली जा चुकी हैं उनमें भारतीय रेलवे, एयर इंडिया के लिए 100% निजीकरण के प्रयास और यहां तक कि सेल, शिपिंग कॉर्प ऑफ इंडिया (एससीआई), टीएचडीसी इंडिया और एनईपीसीओ आदि के अलावा भारत पेट्रोलियम जैसी तेल और गैस कंपनियां भी शामिल हैं। अपने दूसरे कार्यकाल में कई सरकारी स्वामित्व वाली फर्मों के निजीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने बैंकिंग, बीमा, इस्पात, उर्वरक, पेट्रोलियम और रक्षा उपकरणों सहित 18 रणनीतिक क्षेत्रों की पहचान की है, जहां वह केवल सीमित उपस्थिति बनाए रखेगी । योजना के मुताबिक, रणनीतिक क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र की अधिकतम चार इकाइयां और न्यूनतम एक इकाई परिचालन होगी। सरकार की योजना बाकी से बाहर निकलने की है ।

खनन और अन्वेषण खंड में, जिन क्षेत्रों में सरकार सीमित उपस्थिति बनाए रखेगी, वे कोयला, कच्चे तेल और गैस और खनिज और धातु हैं ।

इसी तरह विनिर्माण, प्रसंस्करण और उत्पादन खंड में, जिन क्षेत्रों में सरकार सीमित उपस्थिति बनाए रखेगी, उनमें रक्षा उपकरण, इस्पात, पेट्रोलियम (रिफाइनरी और विपणन), उर्वरक, बिजली उत्पादन, परमाणु ऊर्जा और जहाज निर्माण शामिल हैं ।

और, सेवा क्षेत्र में, पहचाने गए क्षेत्र हैं-बिजली संचरण, अंतरिक्ष, विकास और हवाई अड्डों, बंदरगाहों, राजमार्गों और गोदामों और गैस परिवहन और रसद (गैस और पेट्रो रसायन व्यापार सहित नहीं), अनुबंध और निर्माण और सामरिक क्षेत्रों और उपक्षेत्रों से संबंधित तकनीकी परामर्श सेवाएं, बुनियादी ढांचे के लिए वित्तीय सेवाएं, निर्यात ऋण गारंटी, ऊर्जा और आवास क्षेत्र, दूरसंचार और आईटी, बैंकिंग और बीमा ।

एक खतरनाक स्थिति

सरकारी तंत्र को पूरी तरह अक्षम मानते हुए भारत में हाल की सरकारें निजीकरण की ओर अधिक से अधिक उन्मुख हो गई हैं । लेकिन यह एक खतरनाक स्थिति है । यह चीजों को प्रभावी ढंग से संभालने में नेतृत्व की विफलता है । नौकरशाही में पक्षपात, भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार का संचार करने के लिए सभी दलों के नेता हमेशा आमादा रहे हैं। उन्हें वही काटना है जो उन्होंने बोया है लेकिन पीड़ित तो मुख्य रूप से मूक जनता ही होती हैं । निजीकरण कोई वास्तविक समाधान नहीं है ।

            आज रूस सरकारी नियंत्रण और सार्वजनिक क्षेत्र के कारण एक प्रमुख शक्ति है जबकि अमेरिका नाजुक स्थिति में है । चालीसवें दशक के दौरान चीन और भारत की समान अर्थव्यवस्थाएं थीं लेकिन अब चीन की जीडीपी सरकारी नियंत्रण और सार्वजनिक क्षेत्र के कारण पांच गुना अधिक हो चुकी है । रूस और चीन की तकनीकी क्षमता और ओलंपिक खेलों में आश्चर्यजनक प्रदर्शन देखने-समझने लायक रहा है ।

 

निर्णयों में संकीर्ण राजनीति

 

भ्रमित राजनीति सिर्फ एक फैशन के रूप में आर्थिक मॉडलिंग का इस्तेमाल करती रही है । साठ के दशक के अंत में राष्ट्रीयकरण का फैशन उभरा। बैंकों, बीमा, पेट्रोलियम और कोयला कंपनियों को मुख्य रूप से राजनीतिक मजबूरियों से तहत राष्ट्रीयकृत किया गया । 14 प्रमुख बैंकों का मामला काफी दिलचस्प रहा है। 22 जनवरी १९६९ को बैंकिंग आयोग को नियुक्त किया गया था, दो साल से भी कम समय के भीतर अपने व्यापक एजेंडे के हिस्से के रूप में राष्ट्रीयकरण या समाजीकरण के मुद्दे पर विचार करने के लिए । बैंकों पर सामाजिक नियंत्रण की योजना 1 फरवरी, 1969 को लागू की गई थी और सरकार की ओर से यही उचित था कि वह इसके प्रभाव को देखने के लिए पर्याप्त समय दे। लेकिन इंदिरा सरकार इतनी जल्दबाजी में थी कि उसने 19 जून, 1969 की रात में 14 प्रमुख बैंकों के राष्ट्रीयकरण की घोषणा कर दी—सिर्फ पांच महीने के भीतर। सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश के बाद सरकार ने 25 जुलाई, 1969 को फिर से संशोधित घोषणा की। आठ राज्यों में १९६७ के विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस पार्टी के भीतर और बाहर इंदिरा गांधी के खिलाफ तत्कालीन राजनीतिक चुनौतियों से कुछ राहत पाने के लिए ऐसे कदम उठाए गए थे। लेकिन १९९१ के बाद से फैशन बदल गया । एक भावना यह उभरकर सामने आई कि सरकारी बैंक भ्रष्टाचार, भारी एनपीए और नुकसान से बेहद अक्षम हो गए और इन बैंकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सामाजिक नियंत्रण में लाया गया और 33 प्रतिशत शेयरों तक विनिवेश किया गया—इस महज एक प्रयोग में सरासर राजनीति के चलते दो दशकों से अधिक की देरी हुई।  लेकिन निर्णयों में इस तरह की संकीर्ण राजनीति ने राष्ट्र को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया ।

 

दरअसल, छोटे उद्यमों को निजी हाथों या स्वयं सहायता समूहों (स्वयं सहायता समूहों) के लिए छोड़ देना चाहिए। मध्य आकार के उद्यमों को समन्वित सहकारी क्षेत्र के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए जबकि बड़े या रणनीतिक उद्यमों को सार्वजनिक क्षेत्र या कम से ५१% सरकारी नियंत्रण के तहत रखा जाय। यहां इन बड़े उद्योगों में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी), स्ट्रैटेजिक अलायंस, बीओटी (बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर), बोल्ट (बिल्ड-ऑपरेट-लीज-ट्रांसफर) आदि का उपयोग जरूरत के अनुसार विशेष रूप से नए उद्यमों में किया जा सकता है । उद्योगों का आरक्षण भारत के लिए नया नहीं है। दो दशक पहले सैकड़ों उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित थे।  सैकड़ों गतिविधियां छोटे उद्योगों के लिए आरक्षित थीं। यह बात और है कि नौकरशाही के भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और अन्य अक्षमताओं और राजनीतिक हस्तक्षेप ने इस तरह के आरक्षण को अकुशल साबित किया और लाइसेंस-कोटा-परमिट राज का नेतृत्व किया । लेकिन, समन्वित सहकारी समितियों के लिए मध्य क्षेत्र को आरक्षित करना आवश्यक है।

पूरी दुनिया में इस महामारी में सार्वजनिक उपक्रमों ने बहुत अच्छी भूमिका निभाई है । जहां तक संभव हो सभी प्रमुख उद्यमों को सार्वजनिक नियंत्रण में चलाया जाना चाहिए ।

मध्य क्षेत्र के लिए समन्वित सहकारी समितियां

सभी मध्यम आकार के उत्पादक, खेतिहर, मजदूर, उपभोक्ता आपूर्ति व व्यापार इकाइयां और कृषि सहायक (एग्रीको) और कृषि आधारित उद्योग समन्वित सहकारी समितियों द्वारा चलाए जाएं तो बेहतर। सामूहिक खेती के भी प्रयोग किए गए हैं विशेषकर साम्यवादी व्यवस्थाओं में। पर परिणाम निराशाजनक ही रहे हैं। अतः समर्थन योग्य नहीं हैं। एफपीओ(फार्म प्रोड्यूसर ऑर्गनाइज़ेशन) स्कीम में कार्पोरट, सहकारी व समूहिक खेती व विपणन प्रयासों को शामिल किया गया है पर इसमें भी परोक्ष  बल कार्पोरट वर्चस्व पर ही है, अतः सहकारिता दबनी है।

अब तक सहकारिता सरकारी विभागों के नियंत्रण में रही है, जिसमें सत्ताधारी राजनेता और नौकरशाह अपना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कब्जा बनाए रखते हैं, जबकि आम सदस्यों की सुनी ही नहीं जाती। परिणाम अक्षमता, घोटाले और नुकसान हैं। ऐसी अधीनस्थ सहकारी समितियां असफल रही हैं। सहकारी समितियों में सरकारों को केवल दोस्त, दार्शनिक और दिशादर्शक की अप्रत्यक्ष सकारात्मक और प्रचारात्मक भूमिका तक ही सीमित रहना चाहिए । कामगारों को पूंजी/भूमि के अनुपात में ब्याज और किराए के अलावा सहकारी समिति से वेतन/मजदूरी/पारिश्रमिक के अलावा शेयरधारक के रूप में लाभांश भी मिलेगा । नयी कृषि व्यवस्था में अनुबंध या कारपोरेट खेती व विपणन पर ज़ोर दिया गया है। प्रउत विचारधारा के अनुसार, इसके बजाय समन्वित सहकारी खेती का विकल्प कम से कम छोटी जोत के लिए उपयुक्त है। इससे कामगारों का पलायन कम होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्रीय विकास में संतुलन और समृद्धि पैदा होगी। महानगरीय क्षेत्रों का बोझ और सामाजिक विकृतियां भी कम होंगी।

 अधिकांश कृषि जोत आकार में काफी छोटी रही हैं और इसलिए अनुत्पादक रही हैं। उन्हें समन्वित सहकारी खेती में शामिल किया जाना चाहिए । इस तरह के सहकारी में अपनी भूमि एकत्र करने वाले प्रत्येक किसान को उस भूमि की वापसी के लिए व्यक्तिगत स्वामित्व अधिकार की गारंटी दी जानी चाहिए, जब उद्यम बंद हो जाय या पुनर्गठित किया जाय। यदि वह समिति से बाहर जाता है तो समिति दोनों पक्षों की सहमति के आधार पर चार विकल्पों का का उपयोग कर सकता है:

क) समिति उसे अपनी भूमि के उपयोग के लिए नकद या वस्तु में किराया देना जारी रख सकता है ।

ख) यदि संभव हो तो समिति उसकी भूमि वापस कर सकता है ।

ग) समिति नकद या सार्वजनिक बांड या दोनों के रूप में, संसाधनों की सीमा में पर्याप्त मुआवजा देकर उससे जमीन खरीद सकती है ।

घ) राज्य सरकार उसकी संतुष्टि तक समकक्ष भूमि आवंटित कर सकती है ।

केंद्र सरकार छोटे कारोबारियों और किसानों के लिए ढेरों योजनाओं की घोषणा करती रही है। समन्वित सहकारी समितियों के माध्यम से इनका समुचित लाभ उठाया जा सकता है। सरकारों को भी सहायता और ऋण-प्रदायन में समन्वित सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों को प्राथमिकता देने के लिए तथा संवर्धन के लिए योजनायें चलानी चाहिए । टीम वर्किंग की कार्यकुशलता और प्रोत्साहन के लिए व्यक्तिगत किसानों और व्यवसायों के सभी प्रोत्साहनों और सब्सिडी को समन्वित सहकारी समितियों और स्वयं सहायता समूहों में डायवर्ट करना आवश्यक है ।

अल्पावधि में स्थानीय संसाधनों का त्वरित उपयोग सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय राजनीतिक-आर्थिक-सांस्कृतिक आवाजों और पहचानों को जल्द से जल्द प्रभाव में लाकर राज्यों और योजनाओं का पुनर्गठन किया जाना चाहिए । निर्माण; औद्योगिक उत्पादन; कृषि उत्पादों, डेयरी, सेवाओं आदि का उत्पादन, प्रसंस्करण और विपणन में समन्वित सहकारी समितियों के माध्यम से इकाइयों के संचालन में इन लोगों को शामिल करना आवश्यक  है ।

भारत में अनौपचारिक सहकारिता के तौर पर ‘स्वयं सहायता समूह’ अच्छा कार्य किए हैं। अब इनसे आगे बढ़कर  समन्वित सहकारिता विकसित करने की जरूरत है। इसमें  राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा जैसा कभी ‘अमूल’ में किया गया था। सरकार इसमें तकनीकी सहायता, ऑडिट व प्रोत्साहनकारी भूमिका रखेगी। नियमों के उल्लंघन व अधिसंख्य सदस्यों द्वारा कुप्रबंध की शिकायत पर सरकार हस्तक्षेप कर सकती है।

कृषि उपज का  उद्योगों की भांति मूल्य निर्धारण करें। समन्वित सहकारिता के माध्यम से इनका विपणन, भंडारण व स्थानांतरण का उपाय करें। यह नहीं भूलना चाहिए कि डेन्मार्क, हालैण्ड, इसराइल, जर्मनी आदि यूरोप के किसानों की मानसिकता भी भारत के किसानों से ज्यादा भिन्न नहीं है। पर उन्हें जब  लगा कि कंपनियों का वर्चस्व उन्हें बर्बाद कर देगा तो उन्होंने सहकारी खेती और विपणन को उत्साह के साथ अपनाया।

अब बिहार, यूपी, छत्तीसगढ़ आदि की सरकारें अपने ही राज्य में रोजगार के अवसर देने को पहले से ज्यादा मजबूर हैं। लेकिन यह एक दीर्घकालिक रणनीतिक प्रक्रिया है । प्रगतिशील समाजवाद का प्रस्ताव रहा है कि प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय संसाधनों के अनुसार अधिक से अधिक उद्यम होने चाहिए जिन्हें समन्वित सहकारी समितियों द्वारा चलाया जाना चाहिए । समन्वित सहकारी समितियां प्रचलित अधीनस्थ सहकारी समितियों की तुलना में वास्तव में कहीं अधिक जन-उन्मुख हैं ।

प्रउत की रोजगार नीति यह है कि संसाधनों के उपयोग और आर्थिक गतिविधियों के स्तर को उचित विकेंद्रीकृत योजना के माध्यम से पर्याप्त रूप से उठाना होगा ताकि हर क्षेत्र में अधिकतम व्यवहार्य रोजगार सुनिश्चित किया जा सके । किसी भी क्षेत्र में संतुलित अर्थव्यवस्था के लिए कृषि में कुल रोजगार का 30-40 प्रतिशत, कृषि आधारित उद्यमों में 20 प्रतिशत, कृषि सहायक उद्यमों में 20 प्रतिशत, गैर-कृषि उद्योगों में 10-20 प्रतिशत, व्यापार-वाणिज्य में 10 प्रतिशत और सफेदपोश गतिविधियों में 10 प्रतिशत की आवश्यकता होती है।

कृषि उपज के मूल्य निर्धारण के मामले में इसे उद्योग के रूप में देखने की सलाह दी जाती है। लागत पर उचित लाभ और जोखिम प्रीमियम के साथ न्यूनतम मूल्य की गारंटी दी जानी चाहिए। कृषि और गैर कृषि क्षेत्रों के बीच आय के अंतर को कम करने की जरूरत है। स्थानीय स्तर पर कृषि आधारित उद्योग उपलब्ध कराकर पैदावार में विविधता लाने की जरूरत है।

कोरोना संकट और श्रम के विपरीत पलायन के साथ, स्थानीय अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान अब एक तात्कालिक दायित्व बन गया है । इसमें उचित है कि अल्पावधि में श्रम-प्रधान तकनीकों, परियोजनाओं और गतिविधियों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए । दीर्घकाल में, मध्यम आकार के उद्यमों में समन्वित सहकारी समितियों के माध्यम से और बड़े उद्यमों और परियोजनाओं में पूंजी गहन तकनीकों को कम से ५१% सार्वजनिक और सरकारी नियंत्रण के तहत में लाया जाना चाहिए ।

आर्थिक नीतियों में ‘मेक इन इंडिया’ तकनीकी हस्तान्तरण हेतु अल्पसमय के लिए ही उपयोग के लायक है। दीर्घकाल में तो यह पूंजीवाद को व्यवस्था पर थोपने व ‘सुख के साथी’ बाहरी कंपनियों के  अवसरवाद का ही उपाय है। अतः टिकाऊ रास्ता तो  ‘मेड इन इंडिया’ ही है। स्थानीय स्तर पर उचितप्रभावी व पर्याप्त रोजगार का सृजन रातोरात संभव तो नहीं होगा। बाहर की कंपनियों और बाज़ार छोड़कर भागने में निपुण वित्तीय संस्थागत निवेशकों (एफ आई आई) के भरोसे रहना भी तो ठीक नहीं।

लोकल सही अर्थों में वोकल हो—यह सुनिश्चित करना होगा। यह सरकारी मदद या खैरात मात्र से संभव नहीं है। स्थानीय स्तर पर आत्मविश्वासस्वाभिमान और सामर्थ्य उत्पन्न करना होगा।  इसी आत्मविश्वासस्वाभिमान और सामर्थ्य को उत्पन्न करने व बढ़ाने के लिए उपेक्षित और कमजोर क्षेत्रों को पहिचान प्रदान करने हेतु भोजपुरीबुंदेलखंडविदर्भसौराष्ट्रआदि की मांग की जाती रही है। इन बातों की उपेक्षा का नतीजा रहा है—क्षेत्रीय असंतुलन और युवा श्रमशक्ति का रोजी-रोटी के लिए पलायन।

भाषा के आधार पर 1956 के राज्यों के पुनर्गठन को निरस्त कर सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक आधार पर भारत में राज्यों का नवगठन आवश्यक है। प्रउत(प्रगतिशील उपयोग तत्व) विचारधारा के अनुसार भारत को 44 समाजों में गठित कर विकासगत नियोजन करने की आवश्यकता है। इसी को लेकर ‘समाज आंदोलन’ है। अबतक देश का दुर्भाग्य रहा है कि क्षेत्रीय अपेक्षाओं को राजनीति और वोट के नज़रिये से ही देखा गया है। जहां ढेर सारी हिंसा हुईनए राज्य उत्तराखंडझारखंडछत्तीसगढ़तेलंगाना गठित कर दिये गए। वोट व दबाव की राजनीति वाली यह मानसिकता व्यवस्था व अनुशासन के लिए ठीक नहीं है। लोकतन्त्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्या केंद्र पहले की उपरोक्त मनोवृत्ति में परिवर्तन करेगा और लोकल को वोकल बनाने की स्वघोषित  नीति के प्रति गंभीर होगा?

प्रोफेसर आर पी सिंह,

वाणिज्य विभाग,

गोरखपुर विश्वविद्यालय

E-mail: rp_singh20@rediffmail.com

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Tuesday, 22 September 2020

हाय रे आज की शिक्षा

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(पूर्व  प्रकाशित 2015 में)

                                                        

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